
भारत बनेगा दुनिया का नया ‘बॉस’
भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक ताकत को नए सिरे से परिभाषित करने की तैयारी कर रहा है. सरकार ने देश को दुनिया की अगली ‘फैक्ट्री’ बनाने के लिए एक ऐसा रोडमैप तैयार किया है, जो अगर सफल रहा तो चीन जैसे देशों के लिए चिंता का विषय बन सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अब 2035 तक देश के निर्यात को तीन गुना बढ़ाकर 1.3 ट्रिलियन डॉलर (करीब 108 लाख करोड़ रुपये) तक ले जाने का लक्ष्य बना रही है. खास बात यह है कि इस बार सरकार का जोर सरकारी खजाने से भारी-भरकम सब्सिडी बांटने पर नहीं, बल्कि उन बुनियादी नियमों को बदलने पर है जो बरसों से तरक्की की राह में रोड़ा बने हुए हैं.
इस बार की रणनीति में ये बात है खास
यह कोई छिपी बात नहीं है कि भारत पिछले कुछ वर्षों से मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की कोशिश कर रहा है. 2014 में ‘मेक इन इंडिया’ अभियान और 2020 में 23 बिलियन डॉलर का इंसेंटिव पैकेज लाने के बावजूद, जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 25% करने का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया. अधिकारियों का मानना है कि पुरानी नीतियां उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं दे पाईं.
इसलिए, इस बार रणनीति बदली गई है. सरकार अब चुनिंदा 15 सेक्टर्स पर फोकस कर रही है. इनमें हाई-एंड सेमीकंडक्टर (चिप्स), धातु और लेदर जैसे ज्यादा रोजगार देने वाले उद्योग शामिल हैं. सरकार का मानना है कि सिर्फ पैसा फेंकने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि एक “साहसिक और केंद्रित” रणनीति की जरूरत है जो सिस्टम के अंदरूनी ढांचे को सुधार सके.
100 अरब रुपये किए जाएंगे खर्च
इस ‘नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन’ के तहत सरकार की योजना देश भर में करीब 30 मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की है. इसके लिए लगभग 100 अरब रुपये (1 बिलियन डॉलर) खर्च किए जाएंगे. ये हब उन जगहों पर बनाए जाएंगे जहां पहले से बुनियादी ढांचा मौजूद है या जो बंदरगाहों के करीब हैं, ताकि सामान को विदेश भेजना आसान हो सके.
हालांकि, चिप्स और एनर्जी स्टोरेज जैसे आधुनिक क्षेत्रों के लिए सरकार ने 218 मिलियन डॉलर का अनुदान भी रखा है. वित्त मंत्रालय और नीति आयोग इस नीति को अंतिम रूप देने में लगे हैं. उम्मीद की जा रही है कि 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट में इस मिशन की विस्तार से घोषणा हो सकती है, हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.
लाल फीताशाही पर सबसे बड़ी चोट
इस पूरे महाप्लान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है नियमों का सरल करना.. भारत में व्यापार करने वालों की सबसे बड़ी शिकायत ‘लाल फीताशाही’ रही है. एक फैक्ट्री लगाने के लिए बिजली, पानी और जमीन की मंजूरी लेने में ही महीनों, और कभी-कभी तो सालों लग जाते हैं. इसके अलावा, केंद्र और राज्य सरकारों के अलग-अलग नियम निवेशकों को उलझा कर रख देते हैं.
इसी समस्या को खत्म करने के लिए एक विशेष सरकारी पैनल का गठन किया जाएगा. इस पैनल की अध्यक्षता एक मंत्री करेंगे और इसमें कैबिनेट सचिव जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे. इस पैनल का काम होगा राज्यों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना कि फैक्ट्रियों को सस्ती और निर्बाध बिजली मिले. साथ ही, यह पैनल यह देखेगा कि अलग-अलग राज्यों के श्रम और व्यापारिक नियम एक-दूसरे से न टकराएं, जिससे कंपनियों की लागत कम हो सके.






