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Bengal SIR: बंगाल के एसआईआर में साधु-संतों को क्यों हो रही परेशानी?

Bengal SIR: बंगाल के एसआईआर में साधु-संतों को क्यों हो रही परेशानी?
Bengal SIR: बंगाल के एसआईआर में साधु-संतों को क्यों हो रही परेशानी?

पश्चिम बंगाल में SIR साधु-संतों के लिए परेशानी खड़ा कर रहा है.

भारत में संन्यास और साधना की परंपरा हजारों साल पुरानी है. जब कोई व्यक्ति संन्यास लेता है, तो वह केवल घर, परिवार और संपत्ति ही नहीं छोड़ता, बल्कि अपनी पुरानी पहचान भी त्याग देता है. उसका नाम बदल जाता है, उसका जीवन बदल जाता है और उसका उद्देश्य भी बदल जाता है. पश्चिम बंगाल के रामकृष्ण मठ और मिशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संन्यास का अर्थ होता है पूरी तरह से आध्यात्मिक जीवन में समर्पण.

लेकिन आज यही संन्यासी एक नई समस्या से जूझ रहे हैं. यह समस्या न तो आध्यात्मिक है और न ही व्यक्तिगत, बल्कि पूरी तरह प्रशासनिक है. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया ने संन्यासियों को अचानक यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनका संन्यास जीवन उनकी सरकारी पहचान से टकरा रहा है.

यह कहानी केवल रामकृष्ण मठ के संन्यासियों की नहीं है. यह कहानी उन सभी लोगों की है, जिन्होंने जीवन की किसी मजबूरी, परिस्थिति या परंपरा के कारण अपनी पुरानी पहचान पीछे छोड़ दी, चाहे वे साधु हों, आदिवासी हों, चाय बागान मजदूर हों या समाज के हाशिए पर जी रहे लोग.

SIR क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

SIR यानी Special Intensive Revision चुनाव आयोग की एक विशेष प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और सही बनाना है. इसमें मतदाताओं का नाम, पता, उम्र, माता-पिता का नाम और अन्य विवरण की जांच की जाती है. यह प्रक्रिया कागजों में बहुत सरल लगती है, लेकिन जमीन पर यह कई लोगों के लिए परेशानी बन गई है. खासतौर पर उन लोगों के लिए, जिनकी जिंदगी के दस्तावेजों में नाम, पता और रिश्तों को लेकर स्पष्टता नहीं है.

Sir

संन्यासियों के लिए SIR से हो रही परेशानी

रामकृष्ण मठ और मिशन के संन्यासी संन्यास लेने के बाद अपने असली माता-पिता से संबंध तोड़ लेते हैं. उनके लिए गुरु ही माता-पिता होते हैं. इसलिए जब वे SIR फॉर्म भरते हैं, तो पिता के स्थान पर गुरु का नाम लिख देते हैं. लेकिन समस्या तब आती है जब उनके पुराने दस्तावेज, जैसे स्कूल प्रमाणपत्र, पासपोर्ट या अन्य रिकॉर्ड में असली माता-पिता का नाम दर्ज होता है. इस अंतर के कारण सरकारी सिस्टम उन्हें अलग-अलग व्यक्ति मानने लगता है. कई संन्यासियों के पास यह साबित करने का हलफनामा नहीं है कि उनका पुराना नाम और नया नाम एक ही व्यक्ति का है. कुछ के पास तो अपने पुराने जीवन का एकमात्र प्रमाण दसवीं कक्षा का प्रवेश पत्र ही है.

मतदान नहीं करते, फिर भी मतदाता सूची में क्यों जरूरी?

रामकृष्ण मठ और मिशन के संन्यासी मतदान नहीं करते. यह नियम स्वामी विवेकानंद ने तय किया था. उनका मानना था कि संन्यासी को राजनीति से पूरी तरह दूर रहना चाहिए. ऐसे में सवाल उठता है कि संन्यासी मतदाता सूची में अपना नाम क्यों दर्ज रखना चाहते हैं. इसका जवाब बहुत व्यावहारिक हैं. दरअसल संन्यासियों को पासपोर्ट बनवाने, वीजा लेने, बैंक खाता खोलने, आश्रम से जुड़े प्रशासनिक काम करने के लिए पहचान की जरूरत होती है. अगर मतदाता सूची में नाम नहीं होगा, तो कई जगह परेशानी होगी. इसलिए वे मतदान नहीं करते, लेकिन पहचान के लिए मतदाता सूची में बने रहना चाहते हैं.

बेलूर मठ में संन्यासियों के लिए विशेष शिविर

बुधवार को बेलूर मठ में संन्यासियों के लिए विशेष SIR शिविर लगाया गया. करीब 90 संन्यासी वहां पहुंचे. कुछ व्हीलचेयर पर थे, कुछ सहारे से चल रहे थे. सभी के हाथों में प्लास्टिक फोल्डर थे, जिनमें उनसे जुड़े कुछ कागज बंद थे. अभदानंद कन्वेंशन सेंटर के अंदर संन्यासी कतारों में बैठे थे. उनके चेहरों पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी. कोई सोच रहा था कि कहीं उसका नाम मतदाता सूची से हट न जाए, तो कोई सोच रहा था कि क्या उसे फिर से अपने पुराने नाम से पहचाना जाएगा.

एक 92 वर्षीय संन्यासी व्हीलचेयर पर आए. उन्होंने बताया कि उनका जन्म नाम सुकुमार मुखर्जी था, लेकिन संन्यास के बाद उनका नाम स्वामी वैद्यनाथानंद हो गया. उन्होंने 1965 में संन्यास लिया था. उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना पासपोर्ट जमा किया है, लेकिन फिर भी उन्हें सुनवाई में आना पड़ा. उनके शब्दों में शिकायत नहीं थी, बल्कि एक शांत पीड़ा थी. मानों वे पूछ रहे हों कि क्या संन्यास के बाद भी इंसान को अपनी सांसारिक पहचान बार-बार साबित करनी पड़ेगी.

बाहर से आए संन्यासियों की बढ़ती परेशानी

कई संन्यासी सिलचर, गुवाहाटी, बोलपुर, पुरुलिया जैसे दूर-दराज के इलाकों से आए थे. कुछ ऐसे भी थे जिनका नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं था. नरेंद्रपुर आश्रम से जुड़े संन्यासियों को सोनारपुर के ब्लॉक ऑफिस जाना पड़ा. उनके लिए यह केवल यात्रा नहीं थी, बल्कि मानसिक थकान भी थी.

संन्यासियों की परेशानी को देखते हुए चुनाव आयोग ने जिला चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिया कि संन्यासियों के लिए आश्रमों और धार्मिक संस्थानों में ही सुनवाई कराई जाए. जिला मजिस्ट्रेट को अर्ध-न्यायिक अधिकारी की तरह अधिकार दिया गया है कि वे दस्तावेज न होने पर भी मानवीय दृष्टिकोण से निर्णय ले सकें. यह कदम राहत भरा है, लेकिन संन्यासियों का मानना है कि यह व्यवस्था पहले से होनी चाहिए थी.

अन्य धार्मिक संस्थानों के संन्यासी के साथ भी यही परेशानी

यह समस्या केवल रामकृष्ण मठ तक सीमित नहीं है. भारत सेवाश्रम संघ और इस्कॉन के संन्यासी भी इसी परेशानी से गुजर रहे हैं. भारत सेवाश्रम संघ के कई संन्यासियों ने अपने संस्थापक को पिता के रूप में लिखा था, जिससे दस्तावेजों में अंतर आ गया. इस्कॉन के कई संन्यासियों को उनके मूल स्थानों से दस्तावेज मंगवाने को कहा गया.

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आदिवासी-सेक्स वर्कर्स के लिए पहचान साबित करने की मजबूरी

SIR की प्रक्रिया कागजों में भले ही तकनीकी हो, लेकिन जमीनी स्तर पर यह इंसानों की भावनाओं, जीवन कहानियों और संघर्षों से जुड़ी हुई है. संन्यासी, मजदूर, आदिवासी और सेक्स वर्कर्स, सभी की जिंदगी की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन परेशानी एक ही है- पहचान साबित करने की मजबूरी.

  1. जंगलमहल और हाथियों के बीच सुनवाई : पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम के जंगलमहल क्षेत्र में लोग वर्षों से हाथियों के साथ रहना सीख चुके हैं. वहां अब SIR की सुनवाई के लिए लोगों को दूर जाना पड़ रहा था, जो खतरनाक साबित हो सकता था. इसलिए प्रशासन ने नए सुनवाई केंद्र गांवों के पास ही खोल दिए. उद्देश्य यही था कि लोग सुरक्षित रहें और बिना डर के अपनी पहचान से जुड़े काम पूरे कर सकें.
  2. चाय बागान मजदूरों के लिए राहत : उत्तर बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों के पास अक्सर जमीन के कागज या पते का प्रमाण नहीं होता. वे पीढ़ियों से बागानों में ही रह रहे हैं. अब चुनाव आयोग ने चाय बागान के रोजगार रिकॉर्ड को पहचान का वैध प्रमाण मान लिया है. इससे हजारों मजदूरों को राहत मिली है.
  3. आदिवासी समुदायों की चिंता: टोटो, बिरहोर और लोढ़ा शबर जैसे आदिवासी समुदायों के पास भी कई बार जमीन या परिवार के दस्तावेज नहीं होते. उनके लिए घर-घर जाकर सत्यापन की व्यवस्था की गई है.
    इन समुदायों के लोगों का कहना है कि अब उन्हें डर कम लग रहा है कि उनका नाम मतदाता सूची से हट जाएगा.
  4. सेक्स वर्कर्स की पीड़ा: समाज का सबसे उपेक्षित वर्ग में शामिल सेक्स वर्कर्स भी इस प्रक्रिया से परेशान हैं. कई महिलाएं दशकों पहले अपने घर से अलग हो गई थीं. उन्हें अपने माता-पिता के नाम तक याद नहीं हैं. सोनागाछी की बेबी खातून ने कहा कि वह केवल इतना जानती हैं कि उनका परिवार किडरपुर में रहता था. उन्हें अपने माता-पिता के नाम नहीं मालूम. एक अन्य महिला रेखा दास के पास खुद के दस्तावेज हैं, लेकिन उनके बेटे के लिए परिवार की जानकारी देना मुश्किल हो गया. चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि किसी का नाम केवल दस्तावेजों की कमी के कारण नहीं हटाया जाएगा.

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