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‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’, जब असरानी की कॉमिक टाइमिंग ने मचाया धमाल, ‘शोले’ का ये किरदार आज भी करता है दिलों पर राज | अमर किरदार

दिवंगत अभिनेता असरानी आज भले ही इस दुनिया में न हो, लेकिन उनके द्वारा निभाए गए कई आइकॉनिक किरदार आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। इन्हीं में से एक है फिल्म ‘शोले’ में निभाया गया ‘जेलर’ का किरदार। साल 1975 में आई रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी इस फिल्म का हर किरदार… फिर चाहे वह गब्बर हो, जय-वीरू हों या ठाकुर लोगों के बीच अमर हो गया।

‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’, जब असरानी की कॉमिक टाइमिंग ने मचाया धमाल, ‘शोले’ का ये किरदार आज भी करता है दिलों पर राज | अमर किरदार
‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’, जब असरानी की कॉमिक टाइमिंग ने मचाया धमाल, ‘शोले’ का ये किरदार आज भी करता है दिलों पर राज | अमर किरदार

हालांकि, इन दिग्गज और गंभीर किरदारों के बीच असरानी का ‘जेलर’ वाला किरदार ऐसा था, जिसने पर्दे पर आते ही तनाव को ठहाकों में बदल दिया। असरानी द्वारा निभाया गया यह किरदार आज भी मीम्स और मिमिक्री कलाकारों की पहली पसंद है। चलिए आज आपको अमर किरदार कॉलम में हम इसी किरदार के बारे में बताते हैं।

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इस किरदार की सबसे बड़ी खासियत इसका विजुअल अपीयरेंस था। छोटी मूंछें, कड़क वर्दी, हाथ में डंडा और चलने का वह अलग अंदाज। दरअसल, कहा जाता है कि सलीम-जावेद की जोड़ी और निर्देशक रमेश सिप्पी ने इस किरदार को ‘चार्ली चैपलिन’ की फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ से प्रेरित होकर गढ़ा था।

‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’ इसके अलावा भी असरानी के कई ऐसे डायलॉग थे, जिन्होंने इस किरदार को अमर बना दिया। फिल्म में एक सीन आता है, जब ‘जेलर’ अपने सिपाहियों को कहते हैं कि आधे इधर जाओ, आधे उधर जाओ… और बाकी हमारे पीछे आओ। इसे अभिनेता ने इतनी गंभीरता से बोला कि लोग लोटपोट हो गए। यह दिखाता है कि वह एक ऐसा नेता है जिसे खुद नहीं पता कि उसे जाना कहां है।

असरानी का अभिनय: कॉमिक टाइमिंग का मास्टरक्लास

असरानी उस समय के एक मंझे हुए अभिनेता थे, लेकिन ‘शोले’ ने उन्हें एक अलग पहचान दी। इस किरदार को निभाने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की। उनकी आवाज में वह अजीब सी कड़कड़ाहट और फिर अचानक डर कर धीमा हो जाना, उनके अभिनय की जान थी। इसके अलावा सीना तान कर चलना और जैसे ही जय-वीरू (धर्मेंद्र-अमिताभ) उनकी खिंचाई करते, उनका कंधा थोड़ा झुक जाना, यह एक शानदार फिजिकल कॉमेडी का उदाहरण था।

जेलर का किरदार क्यों जरूरी था?

‘शोले’ एक बहुत ही इंटेंस एक्शन-ड्रामा फिल्म थी। गब्बर सिंह की दहशत, ठाकुर के कटे हाथ और जय-वीरू की मौत-जिंदगी की लड़ाई के बीच दर्शक को ‘कॉमिक रिलीफ’ की सख्त जरूरत थी। जेलर का किरदार फिल्म की गंभीरता को कम किए बिना दर्शकों को हंसने का मौका देता है। यदि जेलर का किरदार इतना मजाकिया न होता, तो जेल के सीन बोरियत भरे या सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने वाले लगते। लेकिन असरानी ने उन दृश्यों को फिल्म के सबसे यादगार हिस्सों में बदल दिया।

आज भी क्यों है लोकप्रिय?

आज 50 साल बाद भी यह किरदार काफी लोकप्रिय है। सोशल मीडिया पर ‘आधे इधर जाओ’ वाले मीम्स आज भी वायरल होते हैं। कई ब्रांड्स ने अपनी ब्रांडिंग के लिए असरानी के इसी गेटअप का इस्तेमाल किया करते है। बता दें कि यह किरदार सिखाता है कि रोल की लंबाई मायने नहीं रखती, बल्कि किरदार की ‘गहराई’ और उसे निभाने का ‘अंदाज’ उसे अमर बनाता है।

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