इस्लामाबाद वार्ता शुरू होने के एक दिन पहले मुझे अमेरिका में रह रहे एक भारतीय चरण सिंह ने कहा था कि यह वार्ता बेनतीजा समाप्त हो जाएगी, क्योंकि न तो अमेरिका और न ही ईरान इस वार्ता को लेकर बहुत उत्साही हैं. चरण सिंह न्यूजर्सी में उद्यमी और बड़े व्यवसायी हैं तथा अमेरिका की राजनीति में उनकी खासी रुचि है. यद्यपि उनका झुकाव रिपब्लिकन के प्रति है. किंतु वे ताड़ गए थे कि पाकिस्तान जिस तरह से उछल-उछल कर इस वार्ता में ‘बड़ी अम्मा’ बन रहा है, वह युद्ध की असली वजहों से या तो वाकिफ नहीं है या सऊदी अरब के दबाव को झेल नहीं पा रहा.

पाकिस्तान के फेवर में सिर्फ एक बात थी कि वह शी जिनपिंग और ट्रंप दोनों का करीबी बना हुआ है. इसके अलावा ईरान-इजराइल युद्ध से वह सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा था. ईरान की सीमा उसके साथ सटती है. इसलिए युद्ध जितना लंबा खींचेगा, पाकिस्तान में उतनी ही ज्यादा बर्बादी तय है.
दोनों को वक्त मिल गया
अमेरिका और ईरान दोनों कुछ दिनों का समय चाहते थे. प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप को भय था कि युद्ध चलता रहा तो मिड टर्म पोल के बाद उनकी कांग्रेस में बढ़त कम हो जाएगी. उन्होंने वार्ता के ज़रिये ख़ुद को इस आरोप से मुक्त कर लिया कि ईरान पर हमले में इज़राइल के दबाव में ट्रंप कूदे. दूसरी तरफ ईरान को भी अपने सेना के लिए हथियार जुटाने का अवसर मिल गया. चीन और रुस ईरान को हथियार सप्लाई कर रहे हैं और उनके हथियार से लदे जहाज़ों की खेप अब बढ़ेगी. अमेरिका की तरफ से वार्ता करने आये उप राष्ट्रपति जेडी वेंस वार्ता को विफल बताते हुए वापस लौट गये हैं. उधर ईरान का आरोप है कि अमेरिका अपनी शर्तें हम पर लादना चाहता था. ईरान परमाणु निशस्त्रीकरण पर सहमत नहीं था इसीलिए उसने संवर्धित यूरेनियम को सौंपने से स्पष्ट इनकार कर दिया. इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट मध्य पर अपना नियंत्रण ख़त्म करने पर भी ईरान राज़ी नहीं हुआ.
न तीन में रहे न तेरह में
इस वार्ता के फेल होने से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के मंसूबों पर पानी फिर गया. अगर यह वार्ता सफल हो जाती तो विश्व में उनकी प्रतिष्ठा बढ़नी तय थी. परंतु अब वे तीन में रहे न तेरह में. यह अलग बात है कि वे दम भर रहे हैं कि दो हफ़्ते बाद फिर बातचीत फिर हो सकती है. दरअसल, इस्लामाबाद वार्ता के विफल होने की आशंका पहले से थी. क्योंकि पाकिस्तान की मध्यस्थता कोई क्यों स्वीकार करता. यह वार्ता या तो संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में होती अथवा रूस या चीन जैसे देशों में तब भी कोई नतीजा निकलने की उम्मीद होती. यहां तक कि भारत में इस वार्ता का कोई न कोई नतीजा निकलता जरूर. मगर पाकिस्तान का असर किस पर पड़ता और कैसे पड़ता! यही कारण था कि सभी विशेषज्ञों को इस वार्ता के सकारात्मक रहने की उम्मीद नहीं की बराबर थी.
परमाणु निशस्त्रीकरण एक छलावा
दोनों देश अपने-अपने दांव चल रहे थे. होर्मुज तो एक बहाना था. अमेरिका ईरान से संवर्धित यूरेनियम लेना चाहता था. ईरान के पास 500 किलो संवर्धित यूरेनियम है और इससे 6062 एटम बम बनाये जा सकते हैं. संवर्धित यूरेनियम अमेरिका को सौंपने का अर्थ था, ईरान द्वारा ख़ुद को निर्वस्त्र कर देना. क्योंकि जिन देशों के पास परमाणु बम है, उनको अपने पीछे लगा लेना आसान नहीं होता. यदि लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी अपने एटम बम और यूरेनियम अमेरिका को न देते तो 2011 में कर्नल गद्दाफ़ी को अपदस्थ कर उन्हें फांसी पर चढ़ा देना आसान न होता. इसी तरह यूक्रेन यदि 2001 समझौते के तहत अपने एटम बम रुस को न सौंप देता तो आज जिस तरह से यूक्रेन पर रुस मारधाड़ कर रहा है, वह नहीं हो सकता. यूक्रेन पर रुस का युद्ध पिछले चार वर्षों से अधिक समय से चल रहा है.
लीबिया मॉडल का धोखा
इसमें कोई शक नहीं कि 28 फ़रवरी से आठ अप्रैल तक ईरान-अमेरिका जो युद्ध चला, उसमें ईरान को जान-माल का बहुत नुक़सान हुआ. परंतु यदि ईरान के पास यूरेनियम की खेप न होती तो उसका आज बचा रहना संभव नहीं था. इसीलिए ईरान किसी भी हालत में यूरेनियम अमेरिका को सौंपने वाला नहीं. जिस किसी ने लीबिया का हश्र देखा है, वह क्यों लीबिया मॉडल को अपनाएगा! 2003 में लीबिया पर प्रतिबंध हटाने के लालच में राष्ट्रपति कर्नल गद्दाफ़ी ने अपने सारे परमाणु हथियार अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को सौंप दिये थे. बाद में विद्रोहियों ने उनका सफ़ाया कर दिया था. ईरान इस मॉडल को मानने से मना कर रहा और जब तक वह अमेरिका की शर्तों को नहीं मानेगा तब तक कोई भी वार्ता सफल होगी नहीं. अमेरिका का असली निशाना तो ईरान के उन प्रयासों को रोक देना है, जो उसे परमाणु शक्ति संपन्न देश बना सकती हैं.
होर्मुज का असर अमेरिका पर नहीं
जहां तक होर्मुज स्ट्रेट को खोलने का मामला है, अमेरिका का उससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं. होर्मुज का असर पाकिस्तान, भारत से लेकर जापान आदि देशों पर अधिक पड़ेगा. यूं चीन भी ईरान से तेल लेता है इसलिए उसके जहाज़ों के लिए आवाजाही खुली रहेगी. इसके अलावा UAE, सऊदी अरब, ओमान और इराक़ का आयात-निर्यात भी प्रभावित होगा. इसलिए एशियाई देश इस स्ट्रेट के बंद रहने से बहुत ज्यादा प्रभावित होंगे. भारत ने ईरान-अमेरिका युद्ध के बाबत निरपेक्ष रहने की नीति अपनायी है. रुस और चीन ऊपर से भले चुप हों पर अंदरखाने वे ईरान की मदद करेंगे. जापान और दक्षिण कोरिया तो इस मसले पर शीघ्र शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं. वैसे ये देश अमेरिका के सहयोगी देश हैं पर तेल के मामले में ये पूरी तरह होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर हैं. इसलिए ये देश कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहे हैं.
कूटनीतिक समाधान के सब हिमायती
सच बात तो यह है कि आज खुल कर न कोई देश ईरान का समर्थन कर रहा है न अमेरिका का. अमेरिका के साथ तो उसके सहयोगी नाटो (NATO) देश भी नहीं है. सबकी मंशा इस मसले के कूटनीतिक समाधान की है. हालांकि नाटो देशों का होर्मुज स्ट्रेट से तेल का आवागमन तो प्रभावित नहीं हो रहा है किंतु दक्षिण एशिया के साथ उसका अन्य वस्तुओं का आयात-निर्यात अवश्य बाधित है. इसलिए सभी देश इसके कूटनीतिक समाधान के प्रयास में लगे हैं. लेकिन समाधान तलाशने के लिए पाकिस्तान ने जो हड़बड़ी दिखाई उससे उसकी प्रतिष्ठा तो बढ़ी नहीं उलटे खिल्ली और उड़ी. दरअसल, उसका कोई दबाव नहीं है. न अमेरिका पर उसका कोई असर है न ईरान पर. भले वह परमाणु शक्ति संपन्न हो लेकिन माना उसे अमेरिका का पिट्ठू ही जाता है. इधर चीन से भी उसने पींगें बढ़ाईं किंतु वहां सेना की हर क्षेत्र में दख़लंदाज़ी उसका कोई स्थिर स्वरूप नहीं बनने देता.
वार्ता की विफलता का ठीकरा पाकिस्तान पर
यह वार्ता यदि किसी ताकतवर मध्यस्थ देश अथवा संयुक्त राष्ट्र की पहल पर होती तो शायद इस तरह बेनतीजा न रहती. अमेरिका और ईरान दोनों ने उसका इस्तेमाल किया. कोई भी देश उसे लेकर गंभीर नहीं था. रूस तो इस वार्ता पर एकदम चुप था. अलबत्ता चीन ने कुछ पहल अवश्य की. मगर एक साधन-विहीन देश कितनी भी चतुराई दिखाये उसकी पोल खुलती ही है. इसलिए इस बेनतीजा बातचीत का ठीकरा दोनों देश अब पाकिस्तान पर फोड़ेंगे.





