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हिमाचल के ग्लेशियरों में बनी झीलों का खतरा भांपेंगे वैज्ञानिक, इन बिंदुओं पर होगा अध्ययन


कुल्लू: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, मंडी और लाहौल-स्पीति जिलों की ऊंची पहाड़ियों में बनी गोल्फ झीलों (ग्लेशियर लेक) से संभावित खतरे का आकलन अब वैज्ञानिक स्तर पर किया जाएगा। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान मौहल के वैज्ञानिक इन झीलों के प्रभाव और जोखिम का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इस अध्ययन में यह आंका जाएगा कि यदि कोई ग्लेशियर झील फटती है तो निचले क्षेत्रों में कितना नुकसान हो सकता है और कौन-कौन से इलाके इसकी चपेट में आ सकते हैं। खासतौर पर कुल्लू, मंडी और लाहौल रेंज की पहाड़ियों में स्थित झीलों पर यह अध्ययन केंद्रित रहेगा। पार्वती बेसिन की झीलों को इस परियोजना के तहत इंटरवेंशन साइट के रूप में चुना गया है।

ऊंचाई पर 12.49 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई
पार्वती घाटी में स्थित वासुकी झील समुद्र तल से लगभग 14,770 फीट की ऊंचाई पर 12.49 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। वहीं लाहौल-स्पीति की गिपांग (घेपल) झील करीब 13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर 92.09 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। इनके अलावा कई अन्य ग्लेशियर झीलें क्षेत्र के लिए संभावित खतरा बनी हुई हैं। प्रदेश में पहली बार ग्लेशियर झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में भी काम शुरू किया गया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने हिमाचल प्रदेश की चार उच्च जोखिम वाली झीलों को चिह्नित किया है, जिससे इनके वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता और बढ़ गई है।

इन बिंदुओं पर होगा अध्ययन
वैज्ञानिक यह विश्लेषण करेंगे कि झील फटने की स्थिति में बाढ़ का स्तर कितना होगा और इससे निचले क्षेत्रों में कितना नुकसान हो सकता है। साथ ही, संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने के उपायों और सुरक्षा रणनीतियों पर भी काम किया जाएगा। इसके अलावा, लोगों को समय रहते चेतावनी देने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की संभावनाएं भी तलाशी जाएंगी। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2022 तक इन झीलों की सेटेलाइट आधारित स्थिति का रिकॉर्ड उपलब्ध है, लेकिन उसके बाद इनके आकार और स्वरूप में हुए बदलावों का भी इस अध्ययन के दौरान आकलन किया जाएगा।

प्रदेश के कुल्लू, मंडी और लाहौल-स्पीति जिलों में बनी ग्लेशियर झीलों से संभावित खतरे को देखते हुए जीबी पंत संस्थान के वैज्ञानिक विस्तृत अध्ययन करेंगे। इसकी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी जाएगी, जिससे भविष्य में संभावित आपदाओं से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार की जा सके। -आरके सिंह, प्रभारी, गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान, मौहल

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