
भारत में कुछ ऐसे मंदिर हैं जहां पुरुषों का प्रवेश विशेष अवसरों या अनुष्ठानों के दौरान वर्जित है। इनमें अट्टुकल भगवती मंदिर, चक्कुलाथुकावु मंदिर, पुष्कर ब्रह्मा मंदिर, मां कामाख्या मंदिर, संतोषी माता मंदिर और तमिलनाडु के भगवती मंदिर शामिल हैं। यह परंपरा देवी की प्रतीकात्मक पहचान, स्त्री ऊर्जा और पवित्र अनुष्ठानों की रक्षा के लिए अपनाई जाती है।
भारत का अनोखा धार्मिक पहलू: देशभर में कुछ मंदिरों में पुरुषों को विशिष्ट अनुष्ठानों के दौरान प्रवेश की अनुमति नहीं होती। केरल का अट्टुकल भगवती और चक्कुलाथुकावु मंदिर, राजस्थान का पुष्कर ब्रह्मा मंदिर, असम का मां कामाख्या मंदिर, वृंदावन का संतोषी माता मंदिर और तमिलनाडु के भगवती मंदिर ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं। ये नियम देवी की शक्ति और स्त्री ऊर्जा के सम्मान के लिए बनाए गए हैं, ताकि अनुष्ठानों की पवित्रता और आध्यात्मिकता बनी रहे।
अट्टुकल भगवती मंदिर, केरल
केरल के अट्टुकल भगवती मंदिर को अक्सर “महिलाओं का सबरीमाला” कहा जाता है। यहां का सबसे प्रसिद्ध उत्सव अट्टुकल पोंगल के दौरान आयोजित होता है। इस समय लाखों महिलाएं देवी को प्रसाद अर्पित करने के लिए मंदिर में एकत्र होती हैं। विशेष आयोजन के दौरान पुरुषों को मंदिर परिसर से दूर रखा जाता है।
कथावाचक डॉ. शिवम साधक महाराज के अनुसार, यह प्रतिबंध प्रतीकात्मक है। देवी की पूजा उनके उग्र और रक्षाशील स्वरूप में की जाती है और यह अनुष्ठान नारी ऊर्जा की सामूहिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। पुरुषों का बाहर रहना इस अनुष्ठान की आध्यात्मिकता को बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।
चक्कुलाथुकावु मंदिर, केरल
चक्कुलाथुकावु मंदिर भी केरल में स्थित है और इसे महिलाओं के प्रति समर्पित अनुष्ठानों के लिए जाना जाता है। यहां नारी पूजा के दौरान महिला भक्त देवी के रूप में पूजा जाती हैं और पुरुषों का प्रवेश सीमित रहता है। मंदिर का मुख्य पुजारी महिलाओं के पैर धोता है, जो पारंपरिक शक्ति ढांचे का उल्टा प्रतिनिधित्व करता है। इस अनुष्ठान से समाज में महिलाओं की शक्ति और सम्मान को प्रकट किया जाता है।
पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान
राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर भी पुरुषों के लिए कुछ विशिष्ट पूजा स्थलों में प्रवेश को प्रतिबंधित करता है। यहां के नियमों के अनुसार, विवाहित पुरुष कुछ अनुष्ठानों में भाग नहीं ले सकते। पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा द्वारा किए गए यज्ञ के दौरान मां सरस्वती का क्रोध इस निर्णय का कारण बना। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे धार्मिक दृष्टि से स्वीकार किया जाता है।

मां कामाख्या मंदिर, असम
असम का मां कामाख्या मंदिर भारत के शक्तिशाली पीठों में से एक है। यहां देवी की पूजा मानव रूप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक पत्थर की संरचना के रूप में की जाती है, जो स्त्रीत्व और गर्भ का प्रतिनिधित्व करती है।
अंबुबाची मेले के दौरान मंदिर तीन दिन के लिए बंद रहता है। यह अवधि देवी के मासिक धर्म चक्र का प्रतीक है। मंदिर के खुलने के बाद भक्त उर्वरता और सृजनात्मक शक्ति का उत्सव मनाते हैं। पुरुषों पर स्थायी प्रतिबंध नहीं है, लेकिन इस अनुष्ठान में उनका प्रवेश वर्जित रहता है।
संतोषी माता मंदिर, वृंदावन
वृंदावन स्थित संतोषी माता मंदिर में कुछ विशेष अवसरों पर पुरुषों का गर्भगृह में प्रवेश निषिद्ध है। इस समय पूजा का संचालन महिलाओं द्वारा किया जाता है और यह व्रत परिवार के कल्याण और खुशहाली के लिए रखा जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, पुरुषों का बाहर रहना श्रद्धा और पूजा की शुद्धता बनाए रखने का एक तरीका है।
तमिलनाडु के भगवती मंदिर
तमिलनाडु के दक्षिणी भाग में स्थित भगवती मंदिरों में भी पुरुषों का प्रवेश कुछ अनुष्ठानों के दौरान प्रतिबंधित होता है। यहां देवी को कुंवारी देवी के रूप में पूजा जाता है, जो पवित्रता, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भर शक्ति का प्रतीक है। पुरुषों का बाहर रहना इस अनुष्ठान की पवित्रता बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।
परंपरा, प्रतीक और आध्यात्मिक संदेश
इन मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध केवल भौतिक या सामाजिक कारणों से नहीं है। ये परंपराएं देवी की प्रतीकात्मक पहचान, स्त्री ऊर्जा और पवित्र अनुष्ठानों की रक्षा करती हैं। शास्त्रों में कहा गया है, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” इसका अर्थ है, जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां ईश्वर वास करते हैं।
पुरुषों के लिए ये नियम किसी भी तरह की अपवित्रता नहीं दर्शाते। बल्कि यह मंदिर की विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा हैं, जो भक्तों के अनुभव और ऊर्जा संतुलन को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं। इन अनुष्ठानों के माध्यम से समाज में नारी शक्ति का सम्मान और उसकी पवित्रता को स्थापित किया जाता है।





