
वॉशिंगटन: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा काम किया है, जिससे विवाद होना तय है. व्हाइट हाउस परिसर में क्रिस्टोफर कोलंबस की एक नई मूर्ति लगाई गई है. इसके बाद यह मामला सुर्खियों में आ गया है. यह मूर्ति वीकेंड के दौरान ईसेनहावर एक्जीक्यूटिव ऑफिस बिल्डिंग के बाहर स्थापित की गई और यह 2020 में बाल्टीमोर में गिराई गई मूर्ति की कॉपी है. ट्रंप प्रशासन इस कदम को सिर्फ एक सांस्कृतिक पहल नहीं, बल्कि एक बड़े संदेश के तौर पर देख रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक पत्र में इस मूर्ति को वॉशिंगटन लाने के लिए इटालियन-अमेरिकन संगठनों की सराहना की और कहा कि मूल मूर्ति को ‘एंटी अमेरिकन दंगाइयों’ ने गिरा दिया था. व्हाइट हाउस के प्रवक्ता डेविस इंगले ने भी साफ कहा कि इस प्रशासन में क्रिस्टोफर कोलंबस को हीरो माना जाता है और उन्हें उसी रूप में सम्मान दिया जाएगा. हालांकि मूल निवासी उन्हें इस तरह से नहीं देखते. 1492 की यात्रा के बाद उन्हें यूरोपीय उपनिवेशवाद, गुलामी और नरसंहार का प्रतीक माना जाता है.
क्रिस्टोफर कोलंबस क्यों हैं विवादित चेहरा?
यह मूर्ति करीब 13 फीट ऊंची है और इसमें बाल्टीमोर हार्बर से निकाले गए मूल प्रतिमा के कुछ हिस्से भी शामिल हैं. हालांकि इसे आम लोगों के लिए खुला नहीं रखा गया है और चारों तरफ बैरिकेड्स लगाए गए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासन को संभावित विरोध का अंदेशा है. दरअसल, क्रिस्टोफर कोलंबस लंबे समय से अमेरिका में एक विवादित ऐतिहासिक व्यक्तित्व रहे हैं. दरअल 12 अक्तूबर 1492 को वह पहले यूरोपीय व्यक्ति थे जो आज की अमेरिकी जमीन पर पहुंचे. उन्हें ‘नए दुनिया’ तक पहुंचने वाला खोजकर्ता माना जाता है. हालांकि उनके आने से पहले भी यहां इंसान रहते थे, जिन्हें गुलामी और नरसंहार झेलना पड़ा. इस कारण उन्हें यूरोपीय उपनिवेशवाद और मूल निवासियों पर हुए अत्याचारों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.
2020 में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद जब अमेरिका में नस्लीय न्याय को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, तब देशभर में कोलंबस की कई मूर्तियां गिरा दी गईं या हटा दी गईं. उसी दौर में बाल्टीमोर की यह मूर्ति भी गिराकर समुद्र में फेंक दी गई थी. अब ट्रंप प्रशासन का इसे फिर से लगाना इस बहस को फिर जिंदा कर रहा है कि इतिहास को कैसे देखा जाए. इटालियन-अमेरिकन संगठनों का कहना है कि कोलंबस उनकी पहचान और सांस्कृतिक गर्व का प्रतीक हैं. उनके मुताबिक, दशकों तक कोलंबस की विरासत ने लाखों प्रवासियों को एकजुट किया और उन्हें समाज में जगह बनाने में मदद की.





