Swami Ramdev: हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का गुरुवार को शुभारंभ हुआ। 31 अक्टूबर तक चलने वाले इस तीन दिनी सम्मेलन का उद्घाटन उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस मौके पर पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वामी रामदेव और कुलपति आचार्य बालकृष्ण मौजूद रहे।

सम्मेलन के दौरान स्वामी रामदेव ने सनातन धर्म के ग्रंथों की कथित गलत व्याख्याओं और उनमें मिलावट के मुद्दे को उठाया। उन्होंने घोषणा की कि संतों और विद्वानों के मार्गदर्शन में पतंजलि से सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान शुरू किया जाएगा।
सनातन शास्त्रों की व्याख्या पर क्या बोले स्वामी रामदेव?
स्वामी रामदेव ने कहा, कुछ लोग सनातन धर्म के ग्रंथों और देवीदेवताओं से जुड़े प्रसंगों की गलत व्याख्या कर रहे हैं। उनके मुताबिक, भगवान राम, माता सीता, भगवान कृष्ण और भगवान शिव से जुड़े कुछ विवरणों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन ग्रंथों में किसी भी तरह की मिलावट या गलत व्याख्या की पहचान कर उसे ठीक करने की दिशा में काम किया जाएगा। इसके लिए विद्वानों और संतों का सहयोग लिया जाएगा। स्वामी रामदेव ने यह भी कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति पर सवाल उठाने वाले मामलों में जरूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता अपनाया जाएगा।
उन्होंने सामाजिक एकता पर जोर देते हुए कहा कि जाति के आधार पर समाज को बांटने के बजाय सभी को एक मानवीय और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को समानता के भाव से देखना जरूरी है।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बदलाव पर भी जोर
स्वामी रामदेव ने कहा कि सम्मेलन में देशविदेश से विद्यार्थी और विद्वान शोध एवं अध्ययन के लिए पहुंचे हैं। उन्होंने भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने और मैकाले की शिक्षा पद्धति से देश को मुक्त करने की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि वेद, रामायण, महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथ भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका अध्ययन मूल विचारों और संदर्भों के आधार पर किया जाना चाहिए।
आचार्य बालकृष्ण बोले शास्त्रों के मूल स्वरूप पर चर्चा जरूरी
पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने सम्मेलन को केवल अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने और उसके मूल स्वरूप को सामने लाने का प्रयास बताया।
उन्होंने कहा कि प्राचीन ग्रंथों में कथित रूप से जोड़ी गई भ्रामक बातों और मूल विचारों के बीच अंतर को समझने की जरूरत है। उनके मुताबिक, किसी भी शास्त्रीय कथन को तर्क, न्याय और सार्वभौमिक सत्य की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि पतंजलि के माध्यम से आयुर्वेद, योग, वनस्पति विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में शोध किया जा रहा है। उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच की दूरी को कम करना है।
राज्यपाल ने किया तीन पुस्तकों का विमोचन
उद्घाटन समारोह में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारी को बेहतर बनाना भी है।
राज्यपाल ने महर्षि पाणिनि की व्याकरण परंपरा, महर्षि पतंजलि के योगदर्शन और आयुर्वेद सहित विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय विद्वानों के योगदान का उल्लेख किया।
इस अवसर पर ‘भारतीय दर्शनों का इतिहास एवं मीमांसा’, ‘वेदामृत’ और ‘भारतीय दर्शन बोध’ पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।
31 अक्टूबर तक होंगे शोधपत्र और पैनल सत्र
29 से 31 अक्टूबर 2026 तक चलने वाले सम्मेलन में पूर्ण सत्रों के साथ विशेष पैनल चर्चाएं, शोधपत्र प्रस्तुतियां और पोस्टर प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं। महर्षि पतंजलि सभा और ब्रह्मवादिनी सभा जैसे समानांतर सत्र भी रखे गए हैं।
सम्मेलन में संस्कृत, वेद, दर्शन, इतिहास, साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न विषयों पर चर्चा हो रही है। कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, अखिल भारतीय प्राच्य विद्या परिषद की महासचिव प्रो. कविता होले और 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति सहित कई विद्वान शामिल हुए।
आयोजन के दौरान पुस्तक मेले का भी उद्घाटन किया गया। इसमें संस्कृत साहित्य, दर्शन, वैदिक ग्रंथों, आयुर्वेद और प्राच्य विद्या से जुड़ी पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया। सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय ज्ञानविरासत के अध्ययन, संस्कृत के संवर्धन और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा एवं शोध से जोड़ना है।