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100 रुपये के लिए खूनी बवाल… 20 साल पुराना वो केस, जिसमें 3 भाइयों समेत 4 को 5-5 साल की जेल​

100 Rupees Dispute Bareilly: उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की एक अदालत ने 20 साल पुराने एक बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. मात्र 100 रुपये के लेनदेन को लेकर वर्ष 2006 में शुरू हुए खूनखराबे और जानलेवा हमले के मामले में अपर सेशन जज13 उमाशंकर कहार की अदालत ने चार आरोपियों को दोषी […]

100 Rupees Dispute Bareilly: उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की एक अदालत ने 20 साल पुराने एक बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. मात्र 100 रुपये के लेनदेन को लेकर वर्ष 2006 में शुरू हुए खूनखराबे और जानलेवा हमले के मामले में अपर सेशन जज13 उमाशंकर कहार की अदालत ने चार आरोपियों को दोषी करार दिया है. कोर्ट ने चारों को 55 साल के कठोर कारावास और कुल 44 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है. वहीं, इसी विवाद के दौरान हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में दूसरे पक्ष के पितापुत्र को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया है.

मामला बरेली के देवरनियां थाना क्षेत्र स्थित पिपरा नानकार गांव का है. अभियोजन पक्ष के अनुसार, जनवरी 2006 की दोपहर इकबाल और उसके बेटे सरताज की आरोपित पक्ष से उधार के 100 रुपये को लेकर कहासुनी हुई थी. उस समय ग्रामीणों ने बीचबचाव कर मामला शांत करा दिया था.

आरोप है कि उसी दिन शाम करीब 6 बजे बाबू, सलीम, नईम और उनका एक साथी चाकू व लाठीडंडे लेकर इकबाल के घर में घुस आए. उन्होंने घर के अंदर मौजूद इकबाल, उसके बेटे सरताज और बहन कनीज पर जानलेवा हमला कर दिया.

शोर सुनकर पहुंचे ग्रामीणों को देखकर हमलावर भागने लगे. इसी छीनाझपटी और मारपीट के दौरान हमलावर पक्ष के अकरम को भी चाकू लग गया था, जिसकी बाद में इलाज के दौरान मौत हो गई थी. इसके बाद दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस FIR दर्ज कराई गई थी.

कोर्ट की अहम टिप्पणी: नीयत जान लेने की थी तो धारा 307 सिद्ध

जानलेवा हमले के मुकदमे में डीजीसी क्राइम रीतराम राजपूत ने अदालत में 8 गवाह पेश किए. सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया. धारा 307 के तहत दोष साबित करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि पीड़ित को कोई जानलेवा चोट ही लगी हो. यदि हमलावर की मंशा या नीयत जान लेने की थी, तो भी धारा 307 का अपराध पूरी तरह सिद्ध होता है. अदालत ने बाबू, सलीम, नईम और उनके साथी को धारा 307 का दोषी पाते हुए 55 साल की जेल और 44,000 जुर्माने की सजा सुनाई.

अकरम मर्डर केस: पितापुत्र को क्यों मिला संदेह का लाभ?

दूसरे पक्ष द्वारा दर्ज कराए गए हत्या के मुकदमे में आरोप था कि इकबाल ने छुरी से अकरम के सीने पर वार कर उसकी हत्या की थी. हालांकि, कोर्ट ने पाया कि घटना पीड़ित इकबाल के घर के अंदर हुई थी, जहां हमलावर पक्ष हथियार लेकर घुसा था. हमले में कनीज और सरताज के सिर पर गंभीर चोटें आई थीं तथा इकबाल भी घायल हुआ था. अभियोजन पक्ष पीड़ित परिवार को लगी इन गंभीर चोटों का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका.

बचाव पक्ष की यह दलील तर्कसंगत पाई गई कि छीनाझपटी के दौरान खुद हमलावर पक्ष की छुरी अकरम को लग गई थी. इन्हीं विरोधाभासों और संदेह के आधार पर अदालत ने इकबाल और उसके बेटे सरताज को अकरम की हत्या के आरोपों से बरी कर दिया.

नाबालिग का मामला जेजेबी में लंबित

बचाव पक्ष के अधिवक्ता अमजद सलीम ने बताया कि इस घटना में शामिल एक अन्य आरोपी घटना के समय नाबालिग था, इसलिए उसका मामला सुनवाई हेतु पहले ही किशोर न्याय बोर्ड को भेजा जा चुका है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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