ग्रेटर नोएडा में आयोजित उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो के गलियारों से गुजरते हुए महसूस होता है कि सशक्तिकरण शब्द को यहां एक नया अर्थ मिल रहा है. यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि महिलाएं किसी मंच के कोने में खड़ी केवल व्यवस्थाएं संभालती या सजावट का हिस्सा बनती नजर नहीं आतीं, बल्कि अपनेअपने स्टॉल पर पूरे आत्मविश्वास के साथ मौजूद हैं. उनके स्टॉल पर सजे उत्पाद उनकी मेहनत, हुनर और सफलता की कहानी बयां कर रहे हैं.

जिन हाथों ने बरसों तक रसोई, खेतों और करघों पर चुपचाप मेहनत की, वही हाथ आज देशीविदेशी खरीदारों से सौदे तय कर रहे हैं. यह उत्तर प्रदेश का एक नया चेहरा है. आत्मविश्वास से भरी महिलाएं, खरीदारों से संवाद करती युवतियां और बिजनेसटूबिजनेस बैठकों में अपनी बात मजबूती से रखते हुए संभावनाओं के नए द्वार तलाशती उद्यमी. नारी सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ यही है, जहां हर महिला अपनी विशिष्ट पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व के साथ मौजूद है.
अवसरों का सृजन करने वाली उद्यमी
वह किसी की कृपा की आकांक्षी नहीं, बल्कि अवसरों का सृजन करने वाली उद्यमी है. वह सहायता पाने वालों की कतार से आगे बढ़कर अब दूसरों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर पैदा कर रही है. इस तस्वीर की सबसे खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों की 75 महिला उद्यमी एक ही मंच पर अपने हुनर और उद्यम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.
• प्रो. दीप्ति तनेजा
यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो पहली नजर में ही किसी अन्य व्यापार मेले से अलग नजर आता है. यहां स्टॉल हैं, उत्पाद हैं, खरीदार हैं और मोलभाव भी, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह उस बदलाव की झलक भी है, जिसमें ‘घर की महिला’ की पहचान धीरेधीरे एक सफल ‘उद्यमी’ के रूप में स्थापित हो रही है. आगरा की जरीजरदोजी, अमरोहा के मसाले, अयोध्या की हर्बल चाय, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी, कन्नौज का इत्र, गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी और बनारस के कालीन… इन उत्पादों के पीछे खड़ी हर महिला बदलते उत्तर प्रदेश की एक प्रेरक कहानी है.
गाजियाबाद की अंजलि इसका उदाहरण हैं. उन्हें चित्रकारी का शौक था. अक्सर घरेलू जिम्मेदारियों के बीच ऐसे शौक महज ‘हॉबी’ बनकर रह जाते हैं, लेकिन अंजलि ने अपने हुनर को उद्यम का रूप दिया. जिला ग्रामोद्योग विकास के माध्यम से ऋण लेकर उन्होंने सादे कपड़ों पर चित्रकारी का काम शुरू किया. आज उनके डिजाइन किए सूट, दुपट्टे, जींस और ट्राउजर दसदस हजार रुपये तक की कीमत पर बिक रहे हैं. इससे भी अहम बात यह है कि उनके उद्यम से सात अन्य महिलाओं को नियमित रोजगार मिल रहा है. यहीं सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ सामने आता है. ऋण ने उनके उद्यम की शुरुआत का रास्ता खोला, लेकिन सात अन्य महिलाओं को रोजगार देकर उन्होंने अवसरों का दायरा बढ़ाया है.
बदलाव टिकाऊ रूप ले रहा
जब सहायता पाने वाले हाथ दूसरों को सहारा देने लगें, तब समझिए कि बदलाव टिकाऊ रूप ले रहा है. निर्भरता से आत्मनिर्भरता की यह यात्रा महिला उद्यमिता को सामाजिक कल्याण के साथसाथ आर्थिक भागीदारी से जोड़ने का परिणाम है. उत्तर प्रदेश में महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए योगी सरकार की योजनाओं और संस्थागत प्रयासों ने इस दिशा में अवसर उपलब्ध कराए हैं. स्वयं सहायता समूहों से जुड़ाव ने महिलाओं के आत्मविश्वास को नई ताकत दी है.
समूह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अकेली महिला की झिझक को साझा आत्मविश्वास में बदल देता है. गांव की महिला समूह के साथ जुड़कर सीखती है कि हिसाबकिताब कैसे रखा जाता है, उत्पाद की कीमत कैसे तय की जाती है और खरीदारों के साथ बातचीत में अपनी बात मजबूती से कैसे रखी जाती है.
ब्रांडिंग, बिक्री और बाजार विस्तार
ट्रेड शो की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद केवल बिक्री के आंकड़ों में नहीं, बल्कि बाजार को समझने के मिले अवसरों में भी छिपी है. ऐसे बड़े आयोजन में सीधे ग्राहकों के बीच पहुंचने से उद्यमियों को अपने उत्पादों के प्रति बाजार की प्रतिक्रिया जानने का मौका मिलता है. जब कोई खरीदार बेडशीट की बुनावट परखता है या अचार की बोतल पर लगे लेबल को ध्यान से पढ़ता है, तो महिला उद्यमी को अपने उत्पाद के बारे में सीधा फीडबैक मिलता है. यही अनुभव उन्हें उत्पाद तैयार करने के साथसाथ उसकी ब्रांडिंग, बिक्री और बाजार विस्तार की बारीकियां समझने में मदद करता है.
ट्रेड शो में 75 जिलों की 75 महिला उद्यमियों की भागीदारी इस बदलाव को व्यापक स्वरूप देती है. वे यहां केवल अपने उत्पादों की प्रदर्शनी नहीं लगा रहीं, बल्कि अपने हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास का उत्सव भी मना रही हैं. अमरोहा के मसालों की महक, अयोध्या की हर्बल चाय की ताजगी और कन्नौज के इत्र की खुशबू इस उत्सव को खास बनाती है. योगी सरकार की नीतियों और योजनाओं के तहत उपलब्ध अवसरों ने इन महिलाओं को अपने उत्पादों और उद्यमों को बड़े बाजार तक पहुंचाने का मंच दिया है.
इस मंच की एक और खासियत है उत्पादों की विविधता. यहां केवल पारंपरिक हस्तशिल्प ही नहीं, बल्कि नवाचार और नए उद्यमों की झलक भी दिखाई देती है. सिद्धार्थनगर की सरोज देवी केले के रेशे से उत्पाद तैयार कर रही हैं. उनका काम कृषि अपशिष्ट को उपयोगी उत्पादों में बदलने की संभावनाएं सामने रखता है. प्रयागराज की तब्बसुम मकसूद मूंज से टोकरियां और सजावटी सामान बनाती हैं. बलिया की रंजना देवी फिनाइल, टॉयलेट क्लीनर और हैंडवॉश लेकर आई हैं. सोनभद्र की मधुबाला के स्टॉल पर हर्बल साबुन, शहद और जूट बैग हैं, तो खीरी की शफीका जूतेचप्पल और बेल्ट के साथ अपने उद्यम का विस्तार कर रही हैं.
उत्पादों की यह विविधता एक महत्वपूर्ण संदेश देती है. महिलाएं जब पारंपरिक दायरों से आगे बढ़कर नए क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाती हैं, तो यह उनके आर्थिक आत्मविश्वास के साथ सामाजिक आत्मविश्वास के विस्तार का भी संकेत होता है. वे अपनी रुचि, कौशल और बाजार की जरूरतों के अनुरूप उद्यम चुन रही हैं. इस तरह उनकी भूमिका केवल परिवार की आय में योगदान देने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि वे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन में भी भागीदार बनती हैं.
सरकारी योजनाओं और ऋण सुविधाओं से लाभ
यहां सरकार की योजनाओं और नीतिगत प्रयासों की भूमिका भी सामने आती है. कई उद्यमियों ने माना है कि सरकारी योजनाओं और ऋण सुविधाओं से उनके काम को गति मिली. जिला ग्रामोद्योग विकास के माध्यम से मिला ऋण हो या राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत गठित स्वयं सहायता समूह, ये संस्थागत सहारे उनके लिए शुरुआती पूंजी, मार्गदर्शन और सामूहिक सहयोग का माध्यम बने हैं. इन अवसरों का लाभ उठाकर महिलाओं ने अपने हुनर को कारोबार में बदला और बाजार तक पहुंचने की राह बनाई.
नीतियों की सार्थकता इसी में है कि वे महिलाओं को आगे बढ़ने के अवसर दें और समय के साथ उन्हें अपने उद्यम का संचालन स्वतंत्र रूप से करने में सक्षम बनाएं. ट्रेड शो जैसे आयोजन इस प्रक्रिया को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यहां महिला उद्यमियों को अपने उत्पादों के प्रदर्शन, खरीदारों से संपर्क और कारोबार के विस्तार की संभावनाएं तलाशने का अवसर मिलता है. उनकी मौजूदगी यह भी दर्शाती है कि ग्रामीण उद्यमिता अब स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि बड़े और वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
बदलाव की यह तस्वीर उत्साहजनक है. कभी जिस महिला की पहचान उसके पति, पिता या बेटे के नाम से होती थी, वह आज अपनी फर्म के नाम से जानी जा रही है. चाहे वह ‘सॉल फॉर अर्थ’ हो, ‘अंजलि क्रिएशन’ हो या ‘प्रतिभा डिजाइनर हब’. नाम का यह बदलाव मामूली नहीं है. इसके पीछे एक महिला की मेहनत, उसका आत्मविश्वास और अपने दम पर कुछ कर दिखाने का संकल्प है. यह बदलाव समाज की सोच को नया आकार देने के साथ महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को भी मजबूत करता है.
सरकारी योजना का मिला लाभ
महिला सशक्तीकरण का वास्तविक पैमाना केवल यह नहीं कि किसी महिला को सरकारी योजना का लाभ मिला या उसे कारोबार शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता मिली. असली सफलता तब है, जब वह अपने हुनर और मेहनत के बूते एक पहचान बनाती है, अपने फैसले खुद लेती है और दूसरों के लिए भी अवसरों के नए रास्ते खोलती है.
उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो में नजर आ रही ये महिला उद्यमी इसी बदलाव की तस्वीर पेश कर रही हैं. गांव से ग्लोबल तक की उनकी यात्रा केवल कारोबार के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि अपने नाम, अपने ब्रांड और अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ती नारी शक्ति की कहानी है.