टाटा ट्रस्ट्स, जिनके पास टाटा संस की 66% हिस्सेदारी है, ने टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी के साथ दो ऑपरेटिंग कंपनियों के मर्जर का प्रस्ताव रखा है. इस रीस्ट्रक्चरिंग से कंपनी ‘नॉनबैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी’ और ‘कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी’ के तौर पर अपनी पहचान खत्म कर सकेगी और एक ‘अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी’ का दर्जा बनाए रख सकेगी. सोमवार को टाटा ट्रस्ट्स के जारी बयान के मुताबिक, इस प्रस्तावित रीस्ट्रक्चरिंग में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस के साथ विलय शामिल है. टाटा संस, नमक से लेकर सॉफ्टवेयर, कार और एयरलाइन तक का कारोबार करने वाले ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है.

ट्रस्ट ने किया था विरोध
ट्रस्ट्स ने होल्डिंग कंपनी को लिस्ट कराने का कड़ा विरोध किया है. उन्होंने टाटा संस बोर्ड से इस प्रस्ताव पर विचार करने और जरूरी कदम उठाने को कहा है, जिसमें प्रस्तावित मर्जर के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से पहले ‘नोऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लेना भी शामिल है. ट्रस्ट्स का कहना है कि इस रीस्ट्रक्चरिंग का मकसद यह पक्का करना है कि रीऑर्गनाइज्ड टाटा संस, NBFC या कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रेगुलेटरी क्राइटेरिया के दायरे में न आए.
यह प्रस्तावित रीस्ट्रक्चरिंग ऐसे समय में सामने आई है जब टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस बोर्ड के बीच भविष्य के ओनरशिप स्ट्रक्चर को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं. अक्टूबर 2024 से नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले ट्रस्ट्स ने टाटा संस को लिस्ट कराने का विरोध किया है. जुलाई 2025 में उन्होंने सर्वसम्मति से यह तय किया था कि कंपनी को ‘अनलिस्टेड प्राइवेट एंटिटी’ बनाए रखने की कोशिश की जानी चाहिए.
टाटा संस को बताया था अपरलेयर NBFC
यह मामला तब और जरूरी हो गया जब RBI ने 2022 में टाटा संस को ‘अपरलेयर NBFC’ के तौर पर क्लासिफाई किया. इस दर्जे के साथ रेगुलेटरी लिस्टिंग की शर्त भी जुड़ी होती है. टाटा संस ने NBFC फ्रेमवर्क से बाहर निकलने की कोशिश की थी, लेकिन RBI ने सितंबर में उनकी अपील खारिज कर दी, जिससे लिस्टिंग का मुद्दा अनसुलझा रह गया.
यह विवाद टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की नियुक्ति तक भी पहुंच गया. ट्रस्ट्स ने जुलाई 2025 में उनके तीसरे पांच साल के कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्ति का समर्थन किया था, लेकिन 2026 में बोर्ड के उस फैसले का विरोध किया जिसमें उन्हें फिर से नियुक्त करने की बात कही गई थी, जबकि उन्होंने संकेत दिया था कि वे अगला कार्यकाल नहीं चाहेंगे.
नोएल टाटा और ट्रस्ट्स का तर्क था कि टाटा संस के नियमों के तहत नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स का समर्थन जरूरी है, और उन्होंने बोर्ड के फैसले को अमान्य बताया. इसके बावजूद, बोर्ड ने चंद्रशेखरन का समर्थन किया है और रेगुलेटरी नियमों का पालन करने की दिशा में कदम उठाए हैं. रीस्ट्रक्चरिंग के नए प्रस्ताव से ट्रस्ट को लिस्टिंग की जरूरत पूरी करने का रास्ता मिलेगा, साथ ही टाटा संस एक अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी बनी रहेगी.
टाटा ट्रस्ट का सामने आया नया प्लान
बयान में कहा गया कि टाटा ट्रस्ट्स ने आज टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड में 66% हिस्सेदारी वाले मुख्य शेयरहोल्डर के तौर पर कंपनी के लिए एक रणनीतिक रीऑर्गनाइजेशन प्लान पेश किया. इसे लागू करने पर यह पक्का होगा कि रीऑर्गनाइज्ड कंपनी न तो NBFC होगी और न ही कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी . प्रस्तावित रीऑर्गनाइजेशन में मुख्य रूप से TESS और TCE का टाटा संस में विलय शामिल है. प्रस्ताव के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक, संयुक्त कंपनी का ऑपरेटिंग रेवेन्यू 105,043 करोड़ रुपए होगा, जो कुल आय का 64.3 फीसदी होगा, जबकि फाइनेंशियल एसेट्स से आय 40,072 करोड़ रुपए होगी. रीऑर्गनाइज्ड कंपनी की नेट एसेट्स 200,158 करोड़ रुपए होंगी, जिसमें से ग्रुप कंपनियों में निवेश 177,120 करोड़ एरुपए होगा, यानी कुल नेट एसेट्स का 90 फीसदी से कम. ट्रस्ट्स ने कहा कि इसका मतलब यह होगा कि यह NBFC के लिए मुख्य बिजनेस क्राइटेरिया या CIC के लिए लागू शर्तों को पूरा नहीं करेगी.
इतिहास को फिर दोहराएगी टाटा संस
इस प्रस्ताव से उस ऑपरेटिंग स्ट्रक्चर को भी बहाल किया जाएगा जिसे टाटा संस ने अपने इतिहास के ज्यादातर समय में अपनाया था, जब होल्डिंग कंपनी टाटा ग्रुप कंपनियों में अपने निवेश के साथसाथ ऑपरेटिंग बिजनेस भी चलाती थी. उदाहरण के लिए, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज 2004 में एक अलग सब्सिडियरी के तौर पर अलग होने से पहले टाटा संस का ही एक डिवीजन थी. प्रस्तावित मर्जर को RBI निर्देश, 2025 का पालन करना होगा, जिसमें सेंट्रल बैंक से पहले ‘नोऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लेने की जरूरत भी शामिल है.
ट्रस्ट्स ने कहा कि रीस्ट्रक्चरिंग पूरी होने के बाद, टाटा संस CIC के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर कर देगी. यह प्रस्ताव जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए उस फैसले के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि टाटा संस को एक अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी के तौर पर बनाए रखने की कोशिश की जानी चाहिए.
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि प्रस्तावित स्ट्रक्चर से टाटा ग्रुप का लंबे समय से चला आ रहा ऑर्गनाइजेशनल मॉडल बना रहेगा और साथ ही सभी जरूरी रेगुलेटरी जरूरतों को भी पूरा किया जा सकेगा. यह प्रस्ताव अभी टाटा संस बोर्ड के विचार, RBI की मंज़ूरी और मर्जर की प्रक्रिया पूरी होने पर निर्भर है.
टाटा संस को दिए निर्देश
टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस बोर्ड से कहा है कि वे इस प्रस्ताव पर विचार करें और प्रस्तावित विलय के लिए ज़रूरी RBI का ‘नोऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ हासिल करने की दिशा में कदम उठाएं. प्रस्तावित ढांचे के तहत, टाटा संस के पास टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी की भूमिका के साथसाथ बड़े पैमाने पर ऑपरेटिंग बिजनेस और रेवेन्यू भी होंगे. ट्रस्ट्स ने कहा कि इस ढांचे का मकसद लागू नियमों का पालन करना है और साथ ही टाटा संस को एक अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी बनाए रखना है.
टाटा संस को अभी एक ‘कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी’ के तौर पर क्लासिफाई किया गया है, जो NBFCs की एक कैटेगरी है और मुख्य रूप से ग्रुप कंपनियों में निवेश रखती है. प्रस्तावित मर्जर से ऑपरेटिंग बिजनेस सीधे कंपनी के दायरे में आ जाएंगे, जिससे टाटा संस की एसेट्स और इनकम का स्वरूप काफी हद तक बदल जाएगा.
ट्रस्ट्स ने कहा कि 2004 के बाद RBI ने टाटा संस को ‘नॉनबैंकिंग, नॉनफाइनेंशियल कंपनी’ के तौर पर भी वर्गीकृत किया था. प्रस्तावित मर्जर से TESS और TCE को मिलाकर ऑपरेटिंग बिजनेस को वापस टाटा संस में लाया जाएगा. इस रीस्ट्रक्चरिंग से टाटा संस, टाटा ग्रुप के केंद्र में एक प्राइवेट होल्डिंग कंपनी के तौर पर अपनी स्थिति बनाए रख सकेगी, जबकि उसके कामकाज का रेगुलेटरी आधार बदल जाएगा. इससे ग्रुप का मौजूदा संगठनात्मक ढांचा भी बना रहेगा और टाटा संस को लिस्टेड कंपनी बनने की जरूरत नहीं पड़ेगी.