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दिल्ली-मुंबई नहीं, रिटायरमेंट के बाद यहां बसना चाहते हैं लोग, बुजुर्गों की पहली पसंद बना ये शहर​

अक्सर लोग अपनी पूरी जिंदगी दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े, भागदौड़ वाले शहरों में काम करते हुए बिता देते हैं. लेकिन जब बात रिटायरमेंट की आती है, तो हर किसी को शांति भरे माहौल की तलाश होती है. भारत में अब रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी बिताने के लिए लोगों की पहली पसंद कोई बड़ा […]

अक्सर लोग अपनी पूरी जिंदगी दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े, भागदौड़ वाले शहरों में काम करते हुए बिता देते हैं. लेकिन जब बात रिटायरमेंट की आती है, तो हर किसी को शांति भरे माहौल की तलाश होती है. भारत में अब रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी बिताने के लिए लोगों की पहली पसंद कोई बड़ा मेट्रो शहर नहीं, बल्कि दक्षिण भारत का कोयंबटूर बन गया है. एक समय था जब सीनियर सिटीजन होम को मजबूरी का नाम दिया जाता था. लोग सोचते थे कि जिनके पास कोई विकल्प नहीं है, वही वहां जाते हैं. लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है. अब ये एक लग्जरी लाइफस्टाइल बन चुका है, जहां लोग अपनी मर्जी से बेहतर जिंदगी जीने के लिए जा रहे हैं.

आंकड़ों में कोयंबटूर का दबदबा

कोयंबटूर को यूं ही सीनियर लिविंग की राजधानी नहीं कहा जाता है. हॉस्पिटैलिटी, रियल एस्टेट एडवाइजरी फर्म नोएसिस के संस्थापक नंदीवर्धन जैन के मुताबिक, इस शहर में फिलहाल लगभग 5,500 ऑर्गेनाइज्ड सीनियर लिविंग यूनिट्स हैं. ये आंकड़ा देश के किसी भी अन्य शहर के मुकाबले सबसे ज्यादा है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि इन घरों को खरीदने वाले केवल 25 फीसदी लोग ही स्थानीय हैं. बाकी 75 फीसदी खरीदार चेन्नई, बेंगलुरु, केरल से हैं या फिर मिडिल ईस्ट से लौट रहे एनआरआई हैं. भारत की कुल सीनियर लिविंग प्रॉपर्टी का 22 प्रतिशत हिस्सा अकेले कोयंबटूर में मौजूद है.

कीमतों में आया जबरदस्त उछाल

सीनियर लिविंग अब केवल एक जरूरत नहीं रही है, बल्कि ये प्रीमियम रियल एस्टेट का एक बड़ा हिस्सा बन गई है. चेन्नई स्थित एल्डरकेयर कंसल्टिंग फर्म केयर फाइंडर के फाउंडर पीएस श्रीकुमार बताते हैं कि कोयंबटूर में कुछ साल पहले जिस सीनियर लिविंग विला की कीमत लगभग 70 लाख रुपये थी, आज वो 3.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. ये भारी उछाल साफ बताता है कि लोग अब अपने बुढ़ापे को सुरक्षित, सुविधाजनक, शानदार बनाने के लिए बड़ी रकम खर्च करने से पीछे नहीं हट रहे हैं. समाज में पहले सीनियर कम्युनिटी में जाने को लेकर जो झिझक थी, वो अब तेजी से खत्म हो रही है.

बदल गई खरीदारों की उम्र

करीब एक दशक पहले तक का ट्रेंड बिल्कुल अलग था. तब सीनियर लिविंग प्रोजेक्ट्स में वो लोग जाते थे, जिनकी उम्र 70 पार हो चुकी होती थी. ज्यादातर मामलों में उनके बच्चे उनके लिए ये फैसला लेते थे, क्योंकि उन्हें देखभाल की सख्त जरूरत होती थी. लेकिन आज का खरीदार काफी बदल गया है. आज प्रॉपर्टी खरीदने वाले की औसत उम्र 58 से 65 साल के बीच आ गई है. लोग काम करते हुए या हाल ही में रिटायर होते ही एडवांस में अपने लिए ऐसा घर खरीद रहे हैं. काइट्स सीनियर केयर के फाउंडर राजगोपाल जी बताते हैं कि न्यूक्लियर फैमिली का बढ़ता चलन भी इस मांग को तेजी से बढ़ा रहा है.

कोयंबटूर की खासियत

विजडम सर्कल चलाने वाले नीरज सागर के अनुसार, कोयंबटूर ने रिटायरमेंट कम्युनिटी के इस ट्रेंड को बहुत पहले ही भांप लिया था. इस शहर को ‘दक्षिण भारत का मैनचेस्टर’ कहा जाता है. यहां का मौसम हमेशा खुशनुमा रहता है, जो बुजुर्गों की सेहत के लिए एकदम सही है. इसके अलावा, यहां का बेहतरीन हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर रिटायर हो रहे लोगों को अपनी तरफ खींचता है. इस शहर का चेन्नई के करीब होना, अच्छी एयरपोर्ट कनेक्टिविटी होना भी एक बड़ा फैक्टर है. बुजुर्ग ऐसा शहर चुनना चाहते हैं जहां से उनके बच्चे आसानी से उन तक पहुंच सकें.

बिल्डर्स के लिए है ये चुनौतियां

आगे इस सेक्टर में काफी संभावनाएं हैं. जानकारों का मानना है कि भारत को लगभग 3 लाख ऑर्गेनाइज्ड सीनियर लिविंग यूनिट्स की जरूरत है. रियल एस्टेट कंसल्टेंसी जेएलएल की रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2026 तक भारत में ऑर्गेनाइज्ड सीनियर लिविंग सप्लाई 25,050 यूनिट तक पहुंच जाएगी. हालांकि, बिल्डर्स के लिए ये बिजनेस उतना आसान नहीं है जितना दिखता है. नंदीवर्धन जैन बताते हैं कि सीनियर लिविंग बाहर से रियल एस्टेट जैसा दिखता है, लेकिन असल में ये किसी होटल की तरह काम करता है.

बिल्डर एक बार फ्लैट बेच देता है, लेकिन उसके बाद उसे अगले 20 सालों तक बेहतरीन सर्विस देनी होती है. इसी वजह से खरीदार भी अब केवल बिल्डर का नाम नहीं देखते, बल्कि सर्विस ऑपरेटर का ट्रैक रिकॉर्ड देखकर पैसा लगाते हैं. लोगों को पता है कि वो केवल ईंटपत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि 20 साल की सर्विस खरीद रहे हैं. अगर रखरखाव में थोड़ी सी भी कमी आती है, तो पूरी कम्युनिटी का नाम खराब हो जाता है. कोयंबटूर की सफलता को देखते हुए अब कोच्चित्रिशूर, मैसूर, देहरादून, गोवा, पुडुचेरी जैसे शहरों में भी नए रिटायरमेंट हब तेजी से विकसित हो रहे हैं. लोग अमूमन अपने मौजूदा शहर से 3 से 5 घंटे की दूरी पर ही घर लेना पसंद करते हैं.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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