लोग इस भरोसे के साथ हेल्थ इंश्योरेंस लेते हैं कि जरूरत पड़ने पर इलाज का खर्च बीमा कंपनी उठाएगी, लेकिन कई बार इलाज पूरा होने के बाद बीमा कंपनी किसी न किसी वजह से क्लेम खारिज कर देती है. ऐसे मामलों में यदि बीमा कंपनी के पास ठोस कानूनी आधार नहीं है तो उसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है. ऐसा ही एक मामला हाल ही में सामने आया, महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम फैसले में निजी बीमा कंपनी को 20 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. मामला एक डॉक्टर के बेटे के ब्लड कैंसर के इलाज से जुड़ा है, जिसमें परिवार ने इलाज पर करीब 33.58 लाख रुपये खर्च किए. इसके बावजूद बीमा कंपनी ने बच्चे के बचपन में हुई अस्थायी स्पीच डिले की जानकारी न देने का हवाला देकर क्लेम खारिज कर दिया और पॉलिसी भी रद्द कर दी. आयोग ने कहा कि स्पीच डिले न तो गंभीर बीमारी थी और न ही उसका कैंसर से कोई संबंध था, इसलिए इस आधार पर क्लेम ठुकराना मनमाना, गैरकानूनी. आइए इस मामले से समझने की कोशिश करते हैं कि हेल्थ पॉलिसी से जुड़े जरूरी नियम क्या हैं. कंपनियां कब आपका क्लेम रिजेक्ट कर सकती हैं. क्लेम रिजेक्ट होने पर आपके पास क्या अधिकार बचते हैं.

इंश्योरेंस कंपनी कब क्लेम रिजेक्ट कर सकती है?
कॉन्ट्रैक्ट Utmost Good Faith के सिद्धांत पर आधारित होता है. यानी पॉलिसी लेते समय ग्राहक को अपनी सभी जरूरी जानकारियां सहीसही बतानी होती हैं. अगर आपने कोई जरूरी जानकारी छिपाई है, तो जरूरत के समय कंपनी क्लेम रिजेक्ट कर सकती है. उदाहरण के लिए, अगर पहले से मौजूद किसी सीरियस डिजीज की जानकारी छिपाई गई हो और बाद में उसी बीमारी का इलाज कराया जाए, तो कंपनी क्लेम रिजेक्ट कर सकती है. इसी तरह अगर जिस बीमारी या इलाज को पॉलिसी के टर्म्स एंड कंडीशंस में एक्सक्लूड किया गया है, उसके लिए क्लेम किया जाए, वेटिंग पीरियड पूरा न हुआ हो, फेक डॉक्यूमेंट्स, गलत बिल या फ्रॉड का मामला सामने आए, या फिर पॉलिसी लैप्स हो गई हो अथवा समय पर प्रीमियम जमा न किया गया हो, तो भी इंश्योरेंस कंपनी क्लेम देने से इनकार कर सकती है.
कब क्लेम ठुकराना गलत माना जाएगा?
कंज्यूमर कमीशन और अदालतों के हालिया फैसलों से यह साफ हुआ है कि इंश्योरेंस कंपनी सिर्फ टेक्निकल रीजन या अनुमान के आधार पर क्लेम रिजेक्ट नहीं कर सकती.
- बीमारी और छिपाई गई जानकारी का आपस में कोई संबंध न हो.
- कंपनी आरोप लगाए लेकिन उसे प्रूव न कर सके.
- पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी ने खुद मेडिकल चेकअप कराया हो.
- कंपनी लंबे समय तक पॉलिसी का रिन्यूअल करती रही हो और बाद में उसी आधार पर क्लेम रिजेक्ट कर दे.
- पॉलिसी टर्म्स की गलत इंटरप्रिटेशन करके क्लेम रोका गया हो.
ऐसे मामलों में कंज्यूमर कमीशन कंपनी को क्लेम देने के साथसाथ कम्पेनसेशन देने का भी आदेश दे सकता है. हाल के कई फैसलों में कहा गया है कि केवल संदेह या टेक्निकल आपत्ति के आधार पर क्लेम रिजेक्ट करना डेफिशिएंसी इन सर्विस माना जाएगा.
Material Fact सबसे महत्वपूर्ण क्यों?
इंश्योरेंस विवादों में सबसे ज्यादा विवाद मटेरियर फैक्ट्स यानी जरूरी जानकारी को लेकर होता है. मान लीजिए किसी व्यक्ति ने पहले से मौजूद हार्ट डिजीज छिपाई और बाद में उसी बीमारी का इलाज कराया, तो कंपनी क्लेम रिजेक्ट कर सकती है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति ने हल्के अस्थमा की जानकारी नहीं दी और बाद में कैंसर का इलाज कराया, तो सिर्फ अस्थमा छिपाने के आधार पर कैंसर का क्लेम रिजेक्ट करना सही नहीं माना जाएगा. जब तक कंपनी यह प्रूव न कर दे कि उस जानकारी से इंश्योरेंस रिस्क प्रभावित होता था. हाल के कई फैसलों में कंज्यूमर कमीशन ने इसी सिद्धांत को अपनाया है.
क्लेम खारिज हो जाए तो क्या करें?
अगर बीमा कंपनी आपका क्लेम खारिज कर देती है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. सबसे पहले कंपनी से क्लेम अस्वीकार करने का लिखित कारण मांगें. इसके बाद कंपनी के ग्रिवेंस रिड्रेसल ऑफिसर के पास शिकायत दर्ज करें. यदि वहां भी समाधान नहीं मिलता है, तो बीमा नियामक IRDAI में शिकायत की जा सकती है. इसके बाद भी विवाद बना रहे तो इंश्योरेंस ओम्बड्समैन के पास अपील की जा सकती है. यदि फिर भी न्याय न मिले, तो जिला, राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में मामला दायर कर कानूनी राहत ली जा सकती है.
पॉलिसी खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखें
हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय अपनी मेडिकल हिस्ट्री कभी न छिपाएं और सभी जरूरी दस्तावेज व जांच रिपोर्ट सुरक्षित रखें. पॉलिसी खरीदने से पहले उसकी शर्तें, खासकर एक्सक्लूजन और वेटिंग पीरियड जरूर पढ़ें. इलाज के दौरान अस्पताल के बिल, डिस्चार्ज समरी और डॉक्टर की पर्चियां संभालकर रखें और जरूरत पड़ने पर बिना देरी के क्लेम दर्ज करें.
हालिया कंज्यूमर कमीशन के फैसले से साफ है कि इंश्योरेंस कंपनियां सिर्फ कमजोर या टेक्निकल वजह बताकर क्लेम रिजेक्ट नहीं कर सकतीं. अगर पॉलिसी होल्डर ने सही जानकारी दी है और पॉलिसी की सभी शर्तों का पालन किया है, तो कंपनी को क्लेम का पेमेंट करना होगा. अगर कंपनी बिना सही वजह क्लेम रिजेक्ट करती है, तो उसे क्लेम राशि के साथ मेंटल स्ट्रेस और डेफिशिएंसी इन सर्विस के लिए अतिरिक्त कम्पेनसेशन भी देना पड़ सकता है.




