ईरान-अमेरिका बातचीत टूटने से होर्मुज को लेकर संकट बरकरार है. इस बीच सिंगापुर के विदेश मंत्री की यह बात सही है. होर्मुज स्ट्रेट एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है और उसे रोक कर ईरान ब्लैकमेल कर रहा है. होर्मुज से ज्यादा व्यापार दूसरे जलमार्गों से होता है, अगर सभी देश ऐसा करने लगे तो क्या होगा. होर्मुज कंट्रोल करने की ईरानी जिद है अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है. अब सवाल उठता है कि ईरान-अमेरिका की जंग का नुकसान बाकी दुनिया क्यों उठाए.

होर्मुज कोई साधारण जलमार्ग नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय स्ट्रेट है. यह UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) के दायरे में आती है. UNCLOS के तहत सभी देशों के जहाजों को ट्रांजिट पैसेज (बिना रोक-टोक गुजरने) का अधिकार है. यह अधिकार बिना किसी टैक्स के मिलता है. यानी होर्मुज पर टोल लगाने का मतलब अंतरराष्ट्रीय कानून को सीधी चुनौती देना हो सकता है.
दूसरे समुद्री रास्तों पर भी लगेगा टैक्स
दुनिया में ऐसे कई और समुद्री रास्ते हैं, जहां के इस कदम के बाद टैक्स लगना शुरू हो सकता है. इनमें मलक्का स्ट्रेट जो मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर के बीच आती है. अगर इसपर ये देश लेवी लेने लगे तो, एशिया की सप्लाई चेन चरमरा जाएगी. वहीं बाब-अल-मंदेब जो यमन और जिबूती के बीच और पहले से अस्थिर है. वहीं तुर्की के पास भी बोस्पोरस स्ट्रेट रूप में ऐसा रास्ता है, जहां वह कंट्रोल कर सकता है.
इसके अलावा स्वेज नहर में मिस्र पहले से टोल लेता, क्योंकि ये नहर मानव निर्मित इसलिए टोल कानूनी है. लेकिन होर्मुज में टोल लगने के बाद मिस्र भी स्वेज का राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है.
भारत पर क्या होगा असर?
होर्मुज स्ट्रेट पर टोल या लेवी लगने से भारत के आयात-निर्यात पर सीधा असर पड़ेगा, जिससे भारत का व्यापार काफी महंगा हो जाएगा. इस स्थिति में भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर भी दबाव महसूस हो सकता है और उसे अपनी नीतियों में बदलाव करने पड़ सकते हैं. ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए भारत को वैकल्पिक रास्तों पर काम तेज करना होगा, जिसमें चाबहार बंदरगाह और INSTC विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं. इसके अलावा बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय नौसेना की भूमिका भी बढ़ेगी और उसे होर्मुज क्षेत्र में अधिक सक्रिय होना पड़ेगा.
US-ईरान की बातचीत फेल
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच करीब 21 घंटे तक लंबी शांति वार्ता चली, लेकिन आखिर में कोई समझौता नहीं हो सका. इस बातचीत का मकसद दो हफ्ते के युद्धविराम को स्थायी बनाना था. परमाणु कार्यक्रम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने रूख पर अड़े रहे. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान उनकी शर्तें मानने को तैयार नहीं था. वहीं ईरान ने कहा कि अमेरिका की डिमांड ज्यादा है.





