होर्मुज स्ट्रेट को 28 फरवरी से लगातार तनाव बना हुआ है. इसका सीधा असर सीधे वैश्विक व्यापार और तेल सप्लाई पर पड़ रहा है. इस बीच अमेरिका ने होर्मुज की नाकेबंदी का ऐलान किया है. उसका कहना है कि ईरान को टोल देने वाला एक भी जहाज अब इस रास्ते से नहीं गुजर सकता है. अब यहां पूर्ण नाकेबंदी जैसी स्थिति बन गई है, यहां से एक भी जहाज का गुजरना मुश्किल हो गया है. ट्रंप का कहना है कि नाकेबंदी की वजह ईरान की तेल ब्रिकी को रोकना है.

ईरान और अमेरिका की जिद का असर सीधे वैश्विक व्यापार और खासकर तेल सप्लाई पर पड़ रहा है. इस संकट से सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर देखने को मिल रहा है, क्योंकि उनके अधिकतर तेल टैंकर इसी रास्ते से गुजरते हैं. आइए तीन आंकड़ों से समझते हैं कि किन देशों को ज्यादा नुकसान हो रहा है
1. मार्च में होर्मुज से 220 जहाज गुजरे
पहला बड़ा आंकड़ा मार्च 2026 का है. पूरे महीने में होर्मुज स्ट्रेट से कुल 220 जहाज गुजरे. इनमें से 20 से ज्यादा जहाज चीन के थे. आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान गुजरने वाले ज्यादातर जहाज एशियाई देशों के थे. इसका मतलब साफ है कि एशिया की अर्थव्यवस्थाएं इस समुद्री रास्ते पर काफी निर्भर हैं. अगर यह रास्ता बंद होता है या इसमें रुकावट आती है, तो सबसे बड़ा झटका इन्हीं देशों को लगता है, क्योंकि उनकी ऊर्जा सप्लाई और व्यापार इसी पर टिका है.
2. 1 अप्रैल को 670 जहाज फंसे थे
दूसरा आंकड़ा 1 अप्रैल 2026 का है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दिन होर्मुज स्ट्रेट में करीब 670 जहाज फंसे हुए थे. इनमें सबसे ज्यादा जहाज यूएई के थे, जिनकी संख्या करीब 120 बताई गई है. इसके अलावा ग्रीस के 75 और चीन के 74 जहाज भी इस जाम में फंसे हुए थे. इतने बड़े पैमाने पर जहाजों का फंसना इस बात का संकेत है कि हालात कितने गंभीर हो चुके हैं. जहाजों के फंसने का सीधा असर सप्लाई चेन पर पड़ता है.
3. पाकिस्तान के 18 जहाज फंसे
पाकिस्तान को होर्मुज स्ट्रेट से अपने टैंकर गुजारने के लिए कुल 20 पास मिले थे, लेकिन उसने इनमें से सिर्फ 2 का ही इस्तेमाल किया. अब जब नाकेबंदी की स्थिति बन गई है, तो उसके बाकी 18 जहाज फंस गए हैं. जंग की शुरुआत से अब तक भारत के झंडे वाले 10 जहाज होर्मुज से सुरक्षित निकले हैं, जबकि लगभग 15 से 16 भारतीय जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं. होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. लेकिन चीन, यूएई, ग्रीस और पाकिस्तान जैसे देशों को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ रहा है.





