
सिरमौर : हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर जो चुनौतियां कभी आम थीं, वो अब तेजी से बदलती दिख रही हैं. तीन राज्यों की सीमाओं के साथ सटे जिला सिरमौर के नाहन में स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में स्थापित अत्याधुनिक न्यूरोइलेक्ट्रोफिजियोलॉजी लैब ने जटिल न्यूरो जांच को स्थानीय स्तर पर संभव बनाकर नई पहचान बनाई है.
दरअसल पहले ऐसे मामलों में मरीजों को चंडीगढ़ स्थित पीजीआई जाना पड़ता था. लंबी दूरी, बढ़ता खर्च और गंभीर मरीजों विशेषकर दौरे से पीड़ित बच्चों के लिए सफर करना परिवारों पर भारी पड़ता था, लेकिन पिछले दो वर्षों में तस्वीर बदली है. सैकड़ों बच्चों और वयस्क मरीजों की सफल जांच के साथ यह लैब अब भरोसे का मजबूत केंद्र बनती जा रही है. नाहन में ही जटिल परीक्षण उपलब्ध होने से मरीजों को समय पर निदान और उपचार की दिशा मिल रही है, जिससे आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की राहत मिली है.
जटिल न्यूरो मामलों की अब यहीं हो रही सटीक पहचान
मेडिकल कॉलेज में तैनात पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट एवं असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पवन कुमार ने बताया कि ‘न्यूरोइलेक्ट्रोफिजियोलॉजी लैब शुरू होने के बाद जटिल मामलों की पहचान अब पहले से कहीं अधिक सटीक और तेजी से हो पा रही है. वीडियो ईईजी विशेष रूप से उन बच्चों के लिए बेहद लाभकारी है, जिन्हें बार-बार दौरे पड़ते हैं या जिनकी समस्या सामान्य जांच में स्पष्ट नहीं हो पाती. पहले ऐसे मरीजों को पीजीआई या अन्य बड़े केंद्रों में रेफर करना पड़ता था, जिससे उपचार में देरी होती थी. अब नाहन में ही विस्तृत मॉनिटरिंग और जांच संभव है, जिससे सही समय पर दवाई शुरू की जा रही है और कई मामलों में बच्चों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है.’
डॉ पवन कुमार ने बताया कि इस अत्याधुनिक न्यूरोइलेक्ट्रोफिजियोलॉजी लैब की सबसे अहम मशीन वीडियो ईईजी है. यह तकनीक मस्तिष्क की गतिविधियों को वीडियो मॉनिटरिंग के साथ रिकॉर्ड करती है, जिससे डॉक्टरों को दौरों की सही स्थिति समझने में मदद मिलती है. पारंपरिक ईईजी की तुलना में वीडियो ईईजी अधिक सटीक मानी जाती है, क्योंकि इसमें मरीज की शारीरिक गतिविधियों और मस्तिष्क की तरंगों को एक साथ रिकॉर्ड किया जाता है. इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि दौरे मिर्गी से जुड़े हैं या किसी अन्य न्यूरोलॉजिकल कारण का परिणाम हैं. लंबे समय तक मॉनिटरिंग की सुविधा होने के कारण जटिल और बार-बार आने वाले दौरों के मामलों में यह जांच उपचार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
वीडियो ईईजी सुविधा को और प्रभावी बनाने के लिए एक मशीन मुख्य लैब में और दूसरी सीधे आईसीयू में काम कर रही है. इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि नवजात शिशु से लेकर हर उम्र के मरीजों की जांच बिना देरी के संभव हो पा रही है. खासकर आईसीयू में भर्ती बच्चों के लिए यह व्यवस्था जीवनदायिनी साबित हो रही है, क्योंकि उन्हें कहीं शिफ्ट किए बिना वहीं तत्काल वीडियो ईईजी किया जा सकता है. इससे डॉक्टरों को स्पष्ट पता चल जाता है कि बच्चे को दौरे पड़ रहे हैं या नहीं. दौरे की तीव्रता कितनी है और दवाओं का कितना असर हो रहा है, यह भी तुरंत समझ में आ जाता है. उसी आधार पर दवाओं की सही मात्रा तय की जाती है, जिससे उपचार अधिक सटीक और सुरक्षित बनता है. लैब की उपयोगिता का अंदाजा आंकड़ों से लगाया जा सकता है. साल 2025 में कुल 547 वीडियो ईईजी किए गए, जबकि इस वर्ष अब तक 72 जांचें हो चुकी हैं. यह संख्या बताती है कि दो वर्षों में यह सुविधा क्षेत्र के मरीजों के लिए कितनी अहम साबित हुई है.
लैब में स्थापित दूसरी अत्याधुनिक मशीन से नर्व कंडक्शन स्टडी (एनसीएस/एनसीवी) और ईएमजी के माध्यम से नसों व मांसपेशियों की कार्यक्षमता की जांच की जाती है. इस तकनीक से यह पता लगाया जाता है कि नसें कितनी प्रभावी ढंग से काम कर रही हैं, उनमें कहीं रुकावट या कमजोरी तो नहीं है और मांसपेशियों की कार्यक्षमता सामान्य है या नहीं. लकवा, झनझनाहट, कमजोरी, हाथ-पैरों में सुन्नपन या मांसपेशियों से जुड़ी समस्याओं के मामलों में यह जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में लगभग 150 मरीजों की नसों और मांसपेशियों से संबंधित जांच की गई, जबकि इस वर्ष अब तक 11 मरीज इस सुविधा का लाभ उठा चुके हैं. इससे स्पष्ट है कि दो वर्षों में यह सुविधा सिरमौर ही नहीं, आसपास के क्षेत्रों के मरीजों के लिए भी सटीक और विश्वसनीय जांच का प्रमुख आधार बन चुकी है.
लैब में स्थापित तीसरी अत्याधुनिक मशीन के माध्यम से सुनने और देखने की नसों की कार्यप्रणाली की जांच की जाती है. इस तकनीक से यह पता लगाया जाता है कि कान से मस्तिष्क तक ध्वनि संकेत सही तरीके से पहुंच रहे हैं या नहीं और आंखों से मस्तिष्क तक विजुअल सिग्नल कितनी प्रभावी ढंग से संचालित हो रहे हैं. बच्चों में जन्मजात सुनने की समस्या, विकास में देरी, बार-बार चक्कर आना या दृष्टि से जुड़ी तंत्रिका संबंधी दिक्कतों के मामलों में यह जांच बेहद अहम साबित होती है. आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में सुनने की 40 जांचें और देखने की नस से संबंधित 8 जांचें की गईं. इस वर्ष भी कई मरीजों की जांच लगातार की जा रही है. इससे स्पष्ट है कि यह सुविधा न केवल न्यूरो संबंधी जटिलताओं की समय रहते पहचान में मदद कर रही है, बल्कि मरीजों को बड़े शहरों के चक्कर लगाने से भी राहत दे रही है.
दूरी, खर्च और परेशानी-तीनों से राहत
नाहन से चंडीगढ़ करीब 90 किलोमीटर, पांवटा साहिब से करीब 135, श्री रेणुका जी से करीब 127, शिलाई से लगभग 250 किलोमीटर दूरी पर है. पहले मरीजों को इन दूरियों को तय करना पड़ता था. डॉ पवन के अनुसार अब सिरमौर के अलावा सोलन, शिमला सीमांत क्षेत्र, हरियाणा के नारायणगढ़ और उत्तराखंड के देहरादून से भी मरीज नाहन आ रहे हैं.
आधुनिक चिकित्सा संस्थान की प्राथमिकता
मेडिकल कॉलेज नाहन की प्रिंसीपल डॉ संगीत ढिल्लों ने कहा कि कॉलेज प्रबंधन का उद्देश्य शुरू से ही यह रहा है कि क्षेत्र के लोगों को उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उनके अपने जिले में उपलब्ध हों. उन्होंने बताया कि 70 लाख रुपये की लागत से स्थापित यह लैब स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. भविष्य में भी कॉलेज में आधुनिक उपकरणों और विशेषज्ञ सेवाओं का विस्तार करने के लिए सरकार और प्रबंधन प्रयासरत हैं, ताकि मरीजों को बाहरी राज्यों पर निर्भर न रहना पड़े.
पहाड़ों में आधुनिक चिकित्सा की मजबूत नींव
कुल मिलाकर करीब दो वर्षों में इस लैब ने सिरमौर में स्वास्थ्य सेवाओं की नई मिसाल कायम की है. कम खर्च, सटीक जांच और घर के पास उपलब्ध सुविधा ने सैकड़ों परिवारों को राहत दी है. जिन मरीजों को पहले जटिल न्यूरो जांच के लिए बाहरी राज्यों का रुख करना पड़ता था, वे अब नाहन में ही आधुनिक तकनीक का लाभ उठा रहे हैं. मेडिकल कॉलेज की यह पहल दर्शाती है कि संकल्प और संसाधनों के सही उपयोग से पहाड़ी जिलों में भी अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं मजबूती से स्थापित की जा सकती हैं और यही बदलाव आने वाले समय में क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था को नई दिशा और नई ऊंचाई देगा.





