
रतलाम: खानाबदोश या घुमक्कड़ प्रजाति के रेबारियों का नया ठिकाना इन दोनों मध्य प्रदेश का मालवा बना हुआ है. जहां यह अपने ऊंट और भेड़ों के साथ एक अनोखे पलायन और हर साल होने वाले सफर पर हैं. एमपी के मंदसौर, रतलाम और उज्जैन जिले में खाली हुए खेतों में ऊंट और भेड़ चराने वाले इन चरवाहों की पहचान और रोजी रोटी ही पशुपालन है. जिन्हें पालने के लिए ये अपना घर छोड़कर मध्य प्रदेश की नर्मदा नदी के किनारे तक का पैदल सफर तय करते हैं.
करीब 8 महीने की इस कठिन यात्रा के बाद जब बारिश हो जाती है तो ये अपने क्षेत्र में वापस लौट जाते हैं. इस दौरान इनका पशुधन बढ़ता और घटता रहता है. जिस तरह किसान अपनी फसल को बेचता है, इसी प्रकार ये भी अपने बढ़े हुए पशुधन का व्यापार कर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं.
राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ से आते हैं रेबारी समाज के भेड़ बकरी वाले
अपने कुनबे के साथ भेड़, बकरी चरा रहे गोपी राईका से ईटीवी भारत की टीम की मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि राजस्थान और गुजरात में रहने वाले उनके पूर्वज ऊंट और भेड़ बकरी चराने का कार्य करते रहे हैं. अक्टूबर-नवंबर में इन पशुओं के चारागाह खत्म होने लगते हैं जिसके बाद हम मध्य प्रदेश के मालवा से होते हुए नर्मदा नदी के किनारे तक का सफर ऊंट और भेड़ बकरियों के साथ तय करते हैं.
जैसे आम लोगों के पास जमीन जायदाद होती है, वैसे ही ये भेड़-बकरियां हमारी जमीन और जायदाद हैं. इसी से हमारे समाज में रुतबा और शादी ब्याह के संबंध तय होते हैं. जिसके पास जितनी ज्यादा भेड़ बकरी और पशुधन उसका स्थान समाज में उतना ऊंचा होता है. करीब 8 महीने की यात्रा के बाद जब बारिश आती है तब हम अपने क्षेत्र के लिए लौटने लगते हैं.
अब यह धंधा उतना फायदेमंद नहीं रहा, हमारे बच्चे भी पढ़-लिख कर कुछ और करना चाहते हैं
गोपी बताते हैं कि अब यह धंधा उतना फायदेमंद नहीं रहा. हमारे बच्चे भी अब पढ़-लिख कर कुछ और करना चाहते हैं. रास्ते में बहुत कठिनियां भी आती हैं. सड़क पर भेड़ बकरियों को वाहन टक्कर मार देते हैं. पशु आपस में लड़ाई झगड़ा करते हैं. हमारी भेड़ बकरियां बदमाशों द्वारा चुरा ली जाती हैं. स्थानीय पुलिस और सरकार से भी उतनी मदद नहीं मिल पाती है.





