
आरजेडी के कार्यकारी अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की किस्मत साथ नहीं दे रही. उन्हें हर बार गच्चा खाना पड़ रहा है। यह स्थिति 2024 से ही बनी हुई है. इससे उनका कन्फ्यूजन भी बढ़ता जा रहा है. वे समझ नहीं पा रहे कि उनकी रणनीति फेल क्यों हो जाती है. बड़ी मुश्किल से 2022 में साथ आए नीतीश ने 17 महीने में ही तेजस्वी को झटका दे दिया. 2025 के असेंबली इलेक्शन में वे 2020 की उपलब्धियों को भी अक्षुण्ण नहीं रख पाए. 2026 में राज्यसभा चुनाव के दौरान उनकी बिछाई बिसात बिगड़ गई. 2024 से अब तक उनके खाते में सिर्फ विफलताएं ही आई हैं.
नीतीश ने 2024 में दिया झटका
तेजस्वी यादव को नीतीश कुमार ने 2022 से 2023 के दौरान खूब दुलारा-पुचकारा. नीतीश अक्सर उनके बारे में ऐसी बातें कहते, जिससे वे यकीनन आह्लादित होते रहे होंगे. खासकर इस बात से कि नीतीश ने उन्हें सीएम पद का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. उन्हें 2025 में सपना दिखाया। पर, नीतीश कुमार के बारे में अपने पिता की उस बात को तेजस्वी भूल गए कि उनके पेट में दांत है. नीतीश कुमार को समझना किसी के बूते की बात नहीं. हुआ भी ऐसा ही. नीतीश ने 2024 में राजद से कट्टी कर ली और भाजपा को गले लगा लिया. यह तेजस्वी को पहला बड़ा सियासी झटका था.
विश्वासमत में भी मिली थी मात
तेजस्वी ने दूसरी बार नीतीश को घेरने की कोशिश की. उन्हें पता था कि एनडीए के पास सरकार बनाने का जादुई आंकड़ा तो है, लेकिन मामूली प्रयास से उसे अपदस्थ किया जा सकता है. तेजस्वी के पास तब तकरीबन 115 एमएलए थे। उन्हें सिर्फ 7 का ही बंदोबस्त करना था. इसके लिए उन्होंने बिसात भी बिछाई. बीमा भारती और संजीव समेत जेडीयू के कई विधायकों को पटाया. योजना थी कि आरजेडी विधायक अवध बिहारी चौधरी स्पीकर पद से इस्तीफा नहीं देंगे. एनडीए उन्हें स्वीकार नहीं करेगा. फिर मत विभाजन होगा और तेजस्वी की बिसात काम कर जाएगी. मत विभाजन में दांव उल्टा पड़ गया. तेजस्वी के विधायकों ने ही उन्हें गच्चा दे दिया. नीतीश कुमार ने 125 मतों से विश्वासमत जीता लिया. यह तेजस्वी को जोर से लगा दूसरा झटका था.
विधानसभा चुनाव में भी हुई हार
चूंकि अगले ही साल विधानसभा के चुनाव होने थे. और खटर-पटर करने के बजाय चुनाव की तैयारी ही तेजस्वी को बेहतर विकल्प लगा. उन्होंने साल भर पहले पड़ोसी राज्य झारखंड में महिलाओं के लिए हेमंत सोरेन की मईयां सम्मान योजना का चमत्कार देखा था. तपाक से उन्होंने बिहार में माई-बहिन मान योजना के तहत हर महिला को 2500 रुपए मासिक मदद की घोषणा कर दी .चुनाव आने पर उन्होंने इस योजना की एकमुश्त राशि 30 हजार रुपए देने का भी ऐलान कर दिया. वे यहीं नहीं रुके. दन से हर परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की हास्यास्पद घोषणा कर डाली. अब तक जो लोग तेजस्वी को भरोसमंद मान कर उनके मुरीद हो गए थे, वे नौकरी वाली घोषणा के बाद उनका मजाक उड़ानें लगे. नीतीश ने भी चाणक्य बुद्धि भिड़ाई और हर परिवार की एक महिला के खाते में मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपए भेजने शुरू कर दिए. तेजस्वी यहां भी गच्चा खा गए. राजद 25 सीटों पर ही सिमट गया. महागठबंधन की सम्मिलित सीटें भी 35 पर आकर अंटक गईं.
RS में कांग्रेस विधायकों से धोखा
इसी साल 16 मार्च को हुए राज्यसभा चुनाव में भी तेजस्वी के नेतृत्व वाला महागठबंधन मात खा गया. तेजस्वी ने येन-केन प्रकारेण महागठबंधन से बाहर की विपक्षी पार्टियों को पटाया. 41 का आंकड़ा भी जुटा लिया. पर, इस बार भी वे मात खा गए. अपनों ने ही दगा दे दिया. कांग्रेस के 3 और राजद के एक विधायक ही धोखेबाज निकल गए. इसे हार का सदमा कहें या उत्साह कि अगले ही दिन वे बंगाल में ममता बनर्जी का पैर छूकर आशीर्वाद लेते नजर आए. प्रसंगवश यह उल्लेख भी आवश्यक है कि विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद तेजस्वी शपथ लेते ही सपरिवार तफरीह के लिए विदेश दौरे पर निकल गए थे.
परिवार में भी होती रही है खटपट
तेजस्वी यादव का इसे दुर्भाग्य कहिए कि चुनाव के पहले ही परिवार मे खटपट शुरू हो गई. एक लड़की से रिलेशनशिप के आरोप में उनके बड़े भाई और पूर्व मंत्री तेज प्रताप को पिता लालू ने परिवार और पार्टी से बाहर कर दिया. चुनाव में एनडीए के साथ तेज प्रताप भी तेजस्वी के खिलाफ खड़े हो गए. बहन रोहिणी आचार्य ने भी तेजस्वी के चुनाव रथ पर उनके करीबी सांसद संजय यादव के सवाल होने को लेकर बवाल मचा दिया. बाद में रोहिणी ने तेजस्वी और उनके सहयोगियों पर चप्पल चलाने का ऐसा आरोप लगाया, जिससे परिवार के भीतर का कलह सतह पर आ गया. यह भी तेजस्वी के लिए किसी झटके स





