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याचना नहीं, अब रण होगा… पश्चिम एशिया में किसकी जिद पर हो रही ‘महाभारत’, ईरान युद्ध खत्म क्यों नहीं हो रहा?


हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूं, अन्तिम संकल्प सुनाता हूं. याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन – जय या कि मरण होगा… रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ये पंक्तियां ईरान युद्ध के लिए भी सटीक बैठती हैं. अमेरिका और इजरायल के ईरान पर किए हमले को एक महीने पूरे हो रहे हैं. ट्रंप ने 6 अप्रैल तक एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर को टारगेट न करने की बात कही है. इस बीच, पाकिस्तान में संभावित अमेरिका-ईरान डील की चर्चा है, फिर भी ईरान से दागी मिसाइलें तेल अवीव में तबाही ला रही हैं. इजरायल ने ईरान के खोंडाब हेवी वॉटर रिसर्च रिएक्टर पर हमला किया है. ऐसे में सवाल यह है कि जब ट्रंप बातचीत के मोड में आ गए हैं, ईरान के सुप्रीम लीडर पहले ही दिन मारे जा चुके थे, तो ये लड़ाई रुकती क्यों नहीं है?

ट्रंप बातचीत की टेबल का इंतजार कर रहे हैं लेकिन इजरायल ने पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरान के साथ किसी भी तरह की डील पर आपत्ति जताई है. इजरायल साफ कह रहा है कि पाकिस्तान पर भरोसा कैसे कर सकते हैं? वह तेहरान के खिलाफ अपने ऑपरेशन तेज करता जा रहा है. कुछ घंटे पहले ही इजरायल ने ईरान के एक परमाणु केंद्र को निशाना बनाया. ईरान ने जवाबी कार्रवाई की कसम खा रखी है. उसने फौरन सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर हमला किया, जिसमें कम से कम 10 अमेरिकी सैनिक घायल हो गए. कुछ प्लेन को भी नुकसान पहुंचा है, जिसमें यूएस के कई रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट शामिल हैं.

बातें कर रहे तो मिसाइलें क्यों गिर रहीं?
दुनियाभर के लोगों में कन्फ्यूजन है कि लड़ाई अब भी चल रही है और बातचीत की कोशिशें भी हो रही हैं. अगर 5 या 15 प्वाइंट्स पर बात होनी है तो लड़ाई रोकी क्यों नहीं जा रही? क्या अमेरिका दोनों प्लान पर काम करना चाहता है? क्या इजरायल अभी रुकना नहीं चाहता? और क्या ईरान का बदला अभी पूरा नहीं हुआ है? यहां संदेशा तो सब ला रहे हैं लेकिन मानने वाला कोई नहीं है. इस सवाल का जवाब स्पष्ट रूप से कोई नहीं दे सकता कि इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है.

लड़ाई क्या कभी खत्म नहीं होगी?
पश्चिम एशिया संकट पर कोई किसी को समझा नहीं पा रहा है. असल में ईरान और अमेरिका-इजरायल की लड़ाई अब जीत-हार से आगे पहुंच चुकी है. यह संघर्ष रूस-यूक्रेन की लड़ाई में तब्दील होता दिख रहा है. अमेरिका ने इतनी बमबारी की लेकिन आज भी ईरान के पास दो तिहाई मिसाइलें बची हुई हैं. ‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है.’

लड़ाई जीत की नहीं, दबदबे की है
एक महीने बाद भी संघर्ष का मुख्य कारण अमेरिका और ईरान के बीच गहरा अविश्वास है. ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध से छूट चाहता है. अमेरिका खुलेआम तेहरान के पश्चिम एशिया में दबदबे को खत्म करना चाहता है. हालांकि, सुप्रीम लीडर खामेनेई के मारे जाने के बाद भी ईरान को यह स्वीकार नहीं है. असल में यह लड़ाई पश्चिम एशिया में दबदबे की है. ईरान को कमजोर करके अमेरिका और इजरायल अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते हैं.

ईरान ने खाई है कसम
ईरान अपने सुप्रीम लीडर समेत टॉप लीडरशिप का बदला लेने के लिए जिहाद पर उतर आया है. वह अपने 12 साल के बच्चों को भी लड़ाई में उतार सकता है. यह उसके अस्तित्व की लड़ाई है. यही वजह है कि वह पीछे न हटने की जिद पर अड़ा है. एक तरफ से अमेरिकी सैन्य प्रेशर है तो रूस और चीन से ईरान को मिल रहा रणनीतिक समर्थन संघर्ष को लंबा खींच रहा है.

1. सामान्य असहमति और भरोसा रत्तीभर नहीं: हां, दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल प्रोग्राम को लेकर गहरा मतभेद है. ईरान इन्हें अपना अधिकार मानता है, जबकि अमेरिका इसे खत्म करना चाहता है.

फिर दिनकर की लाइनें मौजूं हो जाती हैं- बांधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बांधना चाहे मन, पहले तो बांध अनन्त गगन, सूने को साध न सकता है, वह मुझे बांध कब सकता है?

2. जीत की परिभाषा अलग-अलग: ईरान पारंपरिक युद्ध के बजाय लंबी लड़ाई में यकीन रखता है, जहां ‘बचे रहना’ ही उसकी जीत है. अमेरिका अपनी सेना और हथियारों के दम पर ईरान को झुकाने की कोशिश में लगा है.

3. लड़ाई की असली वजह: अमेरिका चाहता है कि ईरान का पश्चिम एशिया में प्रभाव कम हो. अब तक शिया बहुल यह देश एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में पहचाना जाता रहा है. उधर, ईरान अपनी पुरानी इमेज को बरकरार रखने के लिए पलटवार की पॉलिसी पर चल रहा है.

4. कूटनीतिक बातचीत ठप: हां, कहने के लिए अमेरिका बातचीत की बात कर रहा है लेकिन दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं. एक को दूसरे की शर्त मंजूर नहीं है. ऐसे में बातचीत होगी भी, तो उससे कोई हल निकलना मुश्किल है.

5 रूस और चीन का मौन समर्थन: ईरान को रूस और चीन का आर्थिक और रणनीतिक सहयोग मिल रहा है, जो अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद उसे टिके रहने में मदद कर रहा है. इसके अलावा, अमेरिका ने सोचा था कि हमले के बाद पहले की तरह ईरान में सरकार विरोधी प्रोटेस्ट होने लगेंगे लेकिन दांव उलटा पड़ गया. राष्ट्रवाद की भावना के साथ अब पूरा देश एकजुट दिख रहा है.

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर, फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुंह खोलेगा. दुर्योधन! रण ऐसा होगा. फिर कभी नहीं जैसा होगा.’

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