
इंदौर। मध्य प्रदेश में ग्रामीण सड़कों के निर्माण का तरीका अब बदल गया है। सुगम संपर्कता परियोजना के तहत जियो-इंवेंट्री और सिपरी सॉफ्टवेयर जैसी तकनीकों का उपयोग कर सड़क निर्माण को पूरी तरह वैज्ञानिक और डेटा आधारित बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि सड़क निर्माण में आधुनिक तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए और गुणवत्ता की निगरानी के लिए ड्रोन तकनीक अपनाई जाए।
परियोजना के तहत प्रदेश में करीब एक हजार करोड़ रुपये की लागत से सड़कें बनाई जाएंगी और 100 से अधिक आबादी वाले मजरों-टोलों को सड़क सुविधा से जोड़ा जाएगा। जनपद पंचायतों को तीन करोड़ रुपये तक के कार्य स्वीकृत करने के अधिकार भी दिए गए हैं।
जियो-इंवेंट्री का मतलब है पहले से बनी सड़कों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना। रिम्स पोर्टल के माध्यम से सड़कों की लोकेशन, लंबाई और स्थिति को मैप पर दर्ज किया जा रहा है।
इसमें राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग, पीएमजीएसवाय और जिला सड़कों को शामिल किया गया है। इससे यह पता चल सकेगा कि कहां सड़क पहले से मौजूद है और कहां नई जरूरत है, जिससे एक ही सड़क दोबारा बनने की समस्या खत्म होगी।
अब तक 33 हजार 655 सड़कों में से 17 हजार 437 सड़कों का जियो-इंवेंट्री कार्य पूरा हो चुका है। प्रदेश के 9 जिलों में 80 प्रतिशत से अधिक सर्वे हो गया है, जिनमें रतलाम, जबलपुर, आगर-मालवा, मंदसौर और पन्ना प्रमुख हैं।
सिपरी सॉफ्टवेयर से तय होगा कहां बनेगी सड़क
सिपरी सॉफ्टवेयर सड़क निर्माण की पूरी योजना तैयार करने में मदद करता है। इसके जरिए यह तय किया जा रहा है कि सड़क कहां बनेगी, उसकी लंबाई-चौड़ाई क्या होगी और कितनी लागत आएगी।
यही नहीं, यह सॉफ्टवेयर यह भी बताता है कि सड़क के साथ कहां पुल, पुलिया या कल्वर्ट की जरूरत है।
नई सड़कों के सर्वे, डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) और लागत का अनुमान भी इसी सॉफ्टवेयर से तैयार किया जा रहा है। इससे योजना में पारदर्शिता आएगी और गलत या अधूरी योजना बनने की संभावना कम होगी।
ड्रोन और डैशबोर्ड से होगी निगरानी
सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग किया जाएगा। साथ ही जनपद, जिला और राज्य स्तर पर डैशबोर्ड के जरिए काम की मानिटरिंग होगी। मैदानी अमले को भी तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे वे नई प्रणाली को बेहतर तरीके से लागू कर सकें। परियोजना के तहत अब तक सात हजार 135 नई सड़कों के प्रस्ताव तैयार हो चुके हैं और 29 जिलों में 1771 सड़कों को स्वीकृति मिल चुकी है।
क्या होगा फायदा
इस नई तकनीक से सड़क निर्माण में दोहराव रुकेगा, योजना अधिक सटीक बनेगी और लागत व समय दोनों की बचत होगी। साथ ही गांवों तक बेहतर और स्थायी सड़क संपर्क सुनिश्चित हो सकेगा।





