मतदान से पहले वोटर की बायोमेट्रिक पहचान की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और सरकार को नोटिस जारी किया है. याचिकाकर्ता ने कहा है कि डुप्लिकेट और फर्जी वोटिंग पर अंकुश लगाना जरूरी है. मतदान केंद्रों पर फिंगर और आईरिस (उंगली और आंखों की पुतली) आधारित बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली इसका एक सटीक उपाय हो सकती है.

वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई की. याचिका में बायोमेट्रिक पहचान व्यवस्था को पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव में लागू करने की मांग की गई थी, लेकिन बिना उचित कानूनी व्यवस्था बनाए इसे अचानक लागू करने को अव्यवहारिक मानते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि वह इसे तुरंत लागू करने पर जोर नहीं दे रहे हैं.
अश्विनी कुमार उपाध्याय की दलील सुनने के बाद चीफ जस्टिस ने आदेश लिखवाते हुए कहा, ‘प्रथमदृष्टया यह साफ है कि कुछ राज्यों में चल रहे चुनावों के लिए इस राहत पर विचार नहीं किया जा सकता है, लेकिन क्या अगले संसदीय चुनावों और विधानसभा चुनावों के लिए ऐसा रास्ता अपनाना सही होगा, इस पर विचार करने की आवश्यकता है.’
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की शक्तियों की तरफ ध्यान दिलाते हुए कहा कि आयोग के पास स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए पूर्ण शक्तियां हैं. ऐसे में चुनाव आयोग यह तय करने में सक्षम है कि बेहतर चुनाव के लिए किस तरह की व्यवस्था हो. जिस व्यवस्था को लागू करने की मांग याचिकाकर्ता कर रहा है, उसके लिए चुनाव से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव की ज़रूरत होगी. इससे बहुत बड़ा वित्तीय बोझ भी पड़ेगा.





