बीमारी होने से पहले ही पता चल जाए तो कितना अच्छा है. इससे समय पर इलाज भी हो सकता है और बीमारी काबू में भी आ सकती है. इसी नियम पर प्रिवेंटिव प्रिसिजन मेडिसिन काम करती है. इसमें बीमारी का सिर्फ इलाज नहीं बल्कि अब यह पहले से ही बीमारी के रिस्क को पहचानने में मदद करती है. इसमें हर व्यक्ति की सेहत को उसके शरीर के हिसाब से समझकर इलाज किया जाता है.

प्रिवेंटिव प्रिसिजन मेडिसिन में डॉक्टर ये देखते हैं कि कि किसी व्यक्ति को बीमारी क्यों और कैसे हो जाती है. डॉक्टर सिर्फ सामान्य लक्षणों या रिपोर्ट्स पर निर्भर नहीं रहते. वे मेडिकल हिस्ट्री से लेकरके आधार पर बीमारी के खतरे का आंकलन करते हैं. इसके अलावा शरीर में मौजूद अच्छे-बुरे बैक्टीरिया यानी माइक्रोबायोम को भी ध्यान में रखते हैं.
माइक्रोबायोम से बीमारी का कैसे पता चलता है
अपोलो स्पैक्ट्रा हॉस्पिटल ( बेंगलुरु) में इंटरनल मेडिसिन विभाग में डॉ. रवि केसारी बताते हैं कि 2024 में International Journal of Molecular Sciences में छपी स्टडी के अनुसार, माइक्रोबायोम कई बीमारियों से जुड़ा हो सकता है. इसकी मदद से समय से बीमारियों की पहचान में मदद मिलती है. इसके साथ ही अब एआई भी बीमारियों की पहचान को आसान बना रहा है.
डेटा और AI कैसे कर रहे हैं मदद?
आजकल हेल्थ रिकॉर्ड, मेडिकल इमेज और जीन से जुड़ा डेटा एक साथ जोड़ा जा रहा है. इन डाटा को समझने में एआई मदद कर रहा है. एआई के जरिए बड़े हेल्थ रिकॉर्ड से लेकर मेडिकल हिस्ट्री का भी पता लगाया जा रहा है. एआई शरीर में बहुत छोटे लक्षणों से भी बीमारी का पता लगा सकता है. नई तकनीकों की मदद से जटिल बीमारियों की भी समय पर पहचान हो रही है. ये टेक्नोलॉजी बहुत छोटे-छोटे संकेतों को भी पहचान सकती है, जिससे बीमारी का पता लक्षण आने से पहले ही चल सकता है।
सही इलाज जल्दी कैसे मिल रहा है?
प्रिवेंटिव प्रिसिजन मेडिसिन सिर्फ बीमारी पहचानने तक सीमित नहीं है, बल्कि सही इलाज चुनने में भी मदद करती है. इसको ऐसे समझें कि एक बीमारी बै क्रोहन डिजीज. इसनें मरीजों का माइक्रोबायोम देखकर यह तय किया जा सकता है कि कौन सी दवा ज्यादा असरदार होगी. इसमें दवा की डोज की सही जानकारी मिल जाती है. ऐसे में बार- बार अलग- अलग दवा देने की जरूरत नहीं पड़ती है





