
Bihar Electricity News: बिहार में बिजली चोरी के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। छापेमारी के नाम पर कार्रवाई तो हुई, मगर FIR दर्ज कराने में महीनों ही नहीं, डेढ़ साल तक की देरी ने पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगा दिया है। पुलिस जब देरी की वजह तलब करने लगी तो महकमे में खलबली मच गई।
नियम साफ है जिस दिन रेड हो, उसी दिन संबंधित थाने में प्राथमिकी दर्ज हो। अगर किसी वजह से FIR दर्ज नहीं होती, तो सनहा दर्ज कर अगले दिन कारण बताते हुए केस दायर किया जाए। लेकिन कई मामलों में यह उसूल ताक पर रख दिया गया। अब जब फाइलें खुलने लगीं तो कार्रवाई संदिग्ध दायरे में आ गई है। वरीय अधिकारियों ने समीक्षा कर स्पष्ट निर्देश दिया है कि विलंब का कारण FIR में ही दर्ज किया जाए।
मामला मुजफ्फरपुर जिले के सरैया और पारू इलाकों से जुड़ा है। सरैया विद्युत सहायक अभियंता ओजैर आलम ने 5 अगस्त 2024 को पारू मोहजम्मा गांव में बिंदेश्वर राय के यहां छापेमारी कर स्मार्ट मीटर बाइपास कर बिजली चोरी का आरोप लगाया था। मीटर जब्त हुआ, कार्रवाई का शोर भी उठा, मगर केस डेढ़ साल तक दबा रहा। आरोप है कि ‘मैनेज’ का खेल नहीं सधा तो 16 फरवरी 2026 को जाकर FIR दर्ज कराई गई।
इसी तरह पारू के मधुरपट्टी में अनिल सिंह, शंकर राम और बहदीनपुर की गीता देवी के यहां जून 2025 में ऊर्जा चोरी की रेड हुई, लेकिन प्राथमिकी जनवरी 2026 में दर्ज हुई। सात महीने की देरी ने विभाग की नीयत पर शक की सुई घुमा दी है।
सूत्रों की मानें तो जनवरी से अब तक 250 से ज्यादा बिजली चोरी के केस जिले के विभिन्न थानों में दर्ज हुए, लेकिन एक भी FIR छापेमारी के दिन दर्ज नहीं की गई। कहीं एक हफ्ते बाद तो कहीं महीनों बाद केस दायर हुआ। देरी का ठीकरा कभी विभागीय अफसरों पर तो कभी पुलिस की लेटलतीफी पर फोड़ा जा रहा है।
इस देरी का सीधा फायदा आरोपियों को मिल रहा है। कोर्ट में बचाव पक्ष छापेमारी को ही संदिग्ध बताकर राहत की मांग कर रहे हैं। ई-साक्ष्य एप पर समय पर वीडियो अपलोड नहीं होने से अभियोजन कमजोर पड़ रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या बिजली चोरी के खिलाफ मुहिम महज़ दिखावा बनकर रह गई है? या फिर रेड के बाद ‘सेटिंग’ का खेल चलता रहा? फिलहाल जांच की आंच तेज है और विभाग में बेचैनी चरम पर।





