
पटना/दिल्ली: नीतीश कुमार बिहार की सत्ता में आए थे संभावनाओं को लेकर। अब राज्य की राजनीति से विदा हो गए हैं, तो आशंकाओं को छोड़कर। चुनावी राजनीति के लिहाज से सबसे बड़ी आशंका उनके वोट बैंक के बचे रहने को लेकर है। राज्य के चुनावी अखाड़े में तीन ही खिलाड़ी हैं। पहला लालू-तेजस्वी का राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और उसके नेतृत्व वाला I.N.D.I.A. ब्लॉक। फिर BJP और नीतीश कुमार का JDU।
पुराने खिलाड़ी: 2005 से JDU मुख्य खिलाड़ी है। उसने जिससे भी हाथ मिलाया, वह सत्ता में आया और दूसरा बाहर निकल गया। लेकिन कहते हैं कि सोहबत का असर पड़ता है। नीतीश का वोट बैंक भी अछूता नहीं रहा। बिहार से नीतीश की विदाई की मजबूरी के पीछे उनके वोट बैंक पर भगवा रंग चढ़ जाने को प्रमुख वजह माना जा रहा है।
बदलाव ले आए: नीतीश कुमार के सत्ता में आने से बिहार में कई तरह के परिवर्तन हुए। एक तो पिछड़ी, दलित जातियों में उपभेद करके RJD के जातिगत आधार को ठेस पहुंचाई। दूसरे, BJP से हाथ मिलाकर हर जाति-वर्ग के नेता के रूप में अपना कद बड़ा कर लिया। लोगों के जीवन स्तर में सुधार, गरीबी में कमी, खपत क्षमता में बढ़ोतरी के अलावा नशाबंदी, महिला आरक्षण, किसान और छात्र-छात्राओं के लिए लाभकारी योजनाओं के बूते सुशासन बाबू की छवि बना ली, सो अलग। जो बिहार दशक भर पहले आर्थिक पिछड़ेपन का उदाहरण माना जाता था, अब वही कई सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर तेज बढ़ोतरी दर्ज करा रहा है।
धारणा बदली: यकीनन, इससे साथ-साथ नीतीश कुमार को लेकर भी धारणाएं बदलीं। इसमें प्रवासी बिहारियों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में काम करने वाले प्रवासी बिहारियों ने जातियों में जकड़े रहने के बजाय विकास और समृद्धि को तरजीह देनी शुरू कर दी। दूसरे राज्यों में जाने के बाद बिहार के लोगों की पहचान जातिगत नहीं रह जाती, वे रह जाते हैं सिर्फ बिहारी। इस पहचान से मेट्रो शहरों में उन्हें कमाना खाना आसान लगने लगता है। यही लोग पर्व त्योहार पर जब घर लौटते हैं, तो अपने समाज में बदलाव का फॉर्म्युला बन जाते
धर्म भारी: आर्थिक रूप से थोड़े-बहुत समृद्ध हुए ऐसे लोगों में जाति के बजाय धर्म को तवज्जो देने की भावना अधिक दिखने लगती है। चंदा देने से लेकर मंदिरों में धार्मिक आयोजनों तक में इनकी भागीदारी कई बार सवर्णों से अधिक दिख जाती है। वे जाति के बजाय अपने आप ही हिंदू समाज का अंग दिखने लगते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों तक में सवर्णों की तुलना में गैर-सवर्णों के अधिक सनातनी होते चले जाने को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
सामाजिक बदलाव: इन्हें नजरअंदाज करने वाले ही बिहार के चुनाव परिणामों को समझने में चूक जा रहे हैं। तो क्या बिहार में ऐतिहासिक रूप से जातिगत व्यवस्था टूट रही है? कहना ही होगा। आज बिहार का समाज धार्मिक आधार पर ऊपर से नीचे तक तेजी से बंट रहा है। आज की तारीख में गांवों में समृद्ध सवर्णों के परिवारों में अधिकतर रिटायर पिता-बाबा, बुजुर्ग विधवाएं या बेरोजगार रहते हैं। कमाऊ लोग नौकरी-पेशा में रमे हुए हैं। उनकी युवा पीढ़ी का गांवों से नाता लगभग टूटा हुआ है। ऐसे में सामाजिक कार्य अपने-आप गैर-सवर्ण युवाओं के कंधे पर होते हैं। वे ईमानदारी से इसे निभाते भी हैं।
चुनाव से संकेत: इसमें खाद-पानी देने का काम संघ और BJP ने बखूबी किया। यही कारण है कि नीतीश से लेकर तमाम दलों के जाति आधारित कथित वोट बैंक अब हिंदू व गैर-हिंदू में सीधे-सीधे बंटते दिख रहे हैं। नीतीश कुमार का अति पिछड़ा वोट बैंक भी इससे अछूता नहीं रहा। उसके कंधे पर BJP ने बहुत बारीकी से नीतीश के साथ-साथ हिंदुत्व को बचाने का जिम्मा भी डाल दिया है। इस बार के विधानसभा चुनाव के एकतरफा परिणामों ने इसे और मजबूती से स्थापित कर दिया है।
बढ़ेगी चुनौती: साल 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की सीटें यूं ही कम नहीं हुई थीं। चिराग पासवान के जरिये नीतीश और उनके वोट बैंक को यही समझाया गया था। अबकी बार अपने वोट बैंक के भगवा रंग में रंगने से सीटों में हुई बढ़ोतरी ने नीतीश को बैकफुट पर धकेल दिया। बिहार में कभी JDU को वोट नहीं मिला, यहां लोग नीतीश कुमार के नाम पर वोट करते थे। चूंकि वह अब दिल्ली कूच कर रहे हैं, इसलिए उनका वोट बैंक JDU के प्रति शायद ही ईमानदार रहे।





