ईरान में सीजफायर की घोषणा को डोनाल्ड ट्रंप और उनके अधीनस्थ मंत्री अमेरिका की ऐतिहासिक जीत बता रहे हैं. ईरान के हार के संदर्भ में पोस्ट और वीडियो शेयर किए जा रहे हैं. रक्षा मंत्री की तरफ से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ की जा रही है. दूसरी तरफ अमेरिका सेना को अपनी जीत नहीं मान रही है. सेना इस मुद्दे पर काफी सतर्क रूख अपना रही है. ताकि पूरी दुनिया में उसकी किरकिरी न हो.

वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक हेगसेथ के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए अमेरिका के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) डेन केन ने जीत को लेकर पूछे गए एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया. दूसरी तरफ हेगसेथ पूरे प्रेस कॉन्फ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ करते नजर आए.
अपनी जीत क्यों नहीं मान रही अमेरिकी सेना
1. ईरान जंग में अमेरिका के 13 सैनिक मारे गए हैं. 12 बुरी तरह घायल हैं, जबकि 170 घायल हैं. सेना जिस उद्देश्य के साथ जंग में उतरी थी, वो भी हासिल नहीं कर पाई. ईरान में न तो तख्तापलट हुआ और न ही ईरान ने सरेंडर किया. उलटे अमेरिकी सेना पर लड़कियों के स्कूलों पर हमले का आरोप है. यह युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है.
2. वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक खाड़ी में अमेरिकी सेना के सभी बेस बर्बाद हो गए हैं. ईरान ने जंग के दौरान उसके कई जहाजों को मार गिराया. अमेरिकी एयरफोर्स ने 12 हजार मिसाइलों से ईरान पर हमला किया, लेकिन रिजल्ट कुछ भी नहीं निकला. इतना ही नहीं, जब ट्रंप ने अमेरिकी सैनिकों से होर्मुज पर कंट्रोल करने के लिए कहा, तो सैनिक पीछे हट गए.
3. जंग में अमेरिकी सैनिकों की तरफ से हमला करने में 40 अरब डॉलर का खर्च किया जा चुका है. यह कुल रक्षा बजट का 5 फीसद है. 2025 में अमेरिका का रक्षा बजट 849 अरब डॉलर था.
4. ट्रंप सीजफायर को लेकर कन्फ्यूजन में हैं. यह फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें समझौता करना है या आगे जंग लड़ना है. सेना इस वजह से जल्दबाजी में कुछ नहीं करना चाहती है. क्योंकि, इससे उसकी किरकिरी होगी.
अमेरिकी सेना के लिए यह जीत क्यों नहीं है?
ईरान पर हमला करते वक्त ट्रंप ने 4 मुख्य उद्देश्य की घोषणा की थी. इनमें पहला उद्देश्य ईरान को पंगु बनाना था, जिससे वो भविष्य में परमाणु हथियार तैयार न कर सके. दूसरा उद्देश्य सत्ता परिवर्तन था. तीसरा उद्देश्य उसके मिसाइलों को खत्म करना था. अमेरिका का चौथा उद्देश्य उसके तेल ठिकानों पर कब्जा करना था.
जंग के 38 दिन बाद भी अमेरिका को इन 4 उद्देश्यों में से एक भी हासिल नहीं हुआ. सैन्य हमले के बाद भी ईरान की जनता अमेरिका के पक्ष में सड़कों पर नहीं उतरी.





