
कहते हैं कि जिस देश के पास जितना सोना, उसकी ताकत भी उतनी ही ज्यादा होती है. अगर सोने के साथ तेल भी मिल जाए, तो अमेरिका जैसी महाशक्ति बनती है. अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा गोल्ड भंडार है. उसके तहखाने में करीब 8133 टन सोना भरा हुआ है. अमेरिका के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 75% से अधिक है. अमेरिका के पास सिर्फ अपना ही सोना नहीं बल्कि उसके तहखाने में 30 से ज्यादा देशों की सोने की सिल्लियां रखी हुई हैं. ये सोना अमेरिका का नहीं है, वो सिर्फ इन गोल्ड का चौकीदार है. लेकिन अब इस चौकीदार पर से भरोसा उठ रहा है. अमेरिकी सत्ता में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनके विवादित फैसलों ने अमेरिका पर भरोसा कम कर दिया है. यही वजह है कि अब ये देश अपना सोना अमेरिका से वापस चाहते हैं ?
30 देशों के सोने की रखवाली करता है अमेरिका
दुनिया के दूसरे सबसे बड़े गोल्ड रिजर्व वाले देश जर्मनी का करीब 37 फीसदी या 1236 टन सोना अमेरिका के तहखाने में रखा है, जिसकी वैल्यू 128 अरब डॉलर से अधिक है. जर्मनी के अलावा इटली का 1060 टन, नीदरलैंड्स का 190 टन सोना अमेरिका की तिजोरी में रखा है. वहीं फ्रांस, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, लेबनान यहां तक कि आईएमएफ (IMF) जैसे संगठनों ने भी अपना सोना अमेरिका के तहखाने में जमा करके रखा है.अमेरिका के सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व के पास 30 से अधिक देशों का सोना सुरक्षित रखा है. सिर्फ अमेरिका ही नहीं ब्रिटेन का बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास करीब 400000 गोल्ड बार को रिजर्व हैं.
भारत का कितना सोना विदेशों में रखा है ?
भारत ने भी अपने गोल्ड रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटेन की तिजोरी में रखा है. आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2025 तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास 880.8 मीट्रिक टन सोना है, जिसमें से 575.8 टन सोना भारत में ही रखा है, जबकि करीब 290.3 मीट्रिक टन सोना विदेशों में जमा हैं. इसमें से अधिकांश गोल्ड बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास रखा है. इसके अलावा बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स , स्विटजरलैंड और अमेरिका के फेडरल बैंक के पास रखा गया है. विदेशों में जमा सोने में से 102 टन सोना वापस भारत आ चुका है.
ये सवाल अक्सर उठता है कि आखिर ये देश अपना सोना अपनी तिजोरी में क्यों नहीं रखते हैं ? क्या उसके पास सोना रखने की जगह नहीं है ? क्या अपने देश में उनका सोना सुरक्षित नहीं है ? ऐसा बिल्कुल नहीं है, विदेशों में सोना रखने के पीछे कई कारण हैं. अमेरिका के पास सोना रखने की परपंरा आज से नहीं, बल्कि दशकों पुरानी है. 1950 से ही जर्मनी समेत दर्जनों यूरोपीय देशों ने अमेरिका के पास अपना सोना जमा करना शुरू कर दिया था. अमेरिका और यूरोप के बीच बड़ा व्यापार होता था. यूरोप अमेरिका को निर्यात करते थे,जिसका भुगतान सोना और डॉलर में होता था. सोना को जहाजों से लाना आसान नहीं था. खर्चा और सुरक्षा दोनों चिंताजनक थे, ऐसे में यूरोपीय देशों को अमेरिका के तरफ से ऑफर मिला कि वो अमेरिकी रिजर्व वॉल्ट में अपना सोना सुरक्षित रखें. उस वॉल्ट के इस्तेमाल पर उन्हें कोई शुल्क भी नहीं देना पड़ता था. अमेरिका के इसके साथ ही ब्रेटन वुड्स सिस्टम तैयार कर दिया, जहां डॉलर को गोल्ड के साथ जोड़ दिया गया. इस तरह से धीरे-धीरे यूरोपीय देशों का सोना अमेरिका के रिजर्व वॉल्ट में पहुंचने लगे.
न्यूयार्क बन गया ग्लोबल ट्रेड सेंटर
सिर्फ खजाना लूटने का डर नहीं, बल्कि सोने की सुरक्षा को लेकर भी यूरोपीय देशों का भरोसा अमेरिका पर बढ़ता रहा. वहीं न्यूयॉर्क वैश्विक व्यापार का का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका था, जहां सोना होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड में लेनदेन करना आसान था. इन गोल्ड रिजर्व के लिए उन्हें ना तो भारी भरकम किराया चुकाना पड़ता था और ना ही उसकी सुरक्षा के लिए माथापच्ची करने की जरूरत थी. सब ठीक था, लेकिन अमेरिका में ट्रंप की वापसी और बदलते वैश्विक समीकरणों ने सीन बदल दिया है. अब ये देश अमेरिका से अपना सोना वापस निकालना चाहते हैं. जर्मनी ने तो शुरूआत भी कर दी है. भारत ब्रिटेन से अपना कुछ टन सोना वापस ला भी चुका है.
विदेशों में सोना रखने के फायदे ?
सुरक्षा, व्यापारिक सुगमता और जोखिम कम करने के लिए अक्सर देश अपने कुल गोल्ड रिजर्व का कुछ हिस्सा विदेशों में रखते हैं. विदेशों में सोना रखने का कारण जोखिम को कम करना है. प्राकृतिक आपदाओं ,राजनीतिक अस्थिरता की वजह से अगर आर्थिक स्थिति खराब होती है तो भी विदेशों में रखा सोना सेफ रहता है. विदेशों में सोना रखने से दूसरे देशों के साथ व्यापार करना आसान होता है. ट्रेड बिल भरने से लेकर लोन लेने में आसानी होती है. विदेशों में सोने पर मिलने वाला ज्यादा ब्याज भी फायदा देता है. अमेरिका में ट्रंप की वापसी के बाद से यूरोपीय यूनियन से संबंधों में दूरी बढ़ रही है. यूरोपीय देश अब अमेरिका से अपना सोना वापस निकालना चाहता है. ट्रंप के फैसलों ने यूरोप का भरोसा हिला दिया है. जिस अमेरिका को दशकों तक यूरोप ने सुरक्षा कवच माना और अपना रणनीतिक गारंटर माना.अब वो उसके खिलाफ है.
ग्रीनलैंड पर ट्रंप की लालच ने यूरोप और अमेरिका की दूरी बढ़ा दी है. ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति के साथ-साथ ‘अमेरिका फर्स्ट’ के एजेंडा ने दोनों के बीच के भरोसे को कम कर दिया है. ट्रंप के आने के बाद से यूरोपीय देश अमेरिका पर भरोसा खो रहे हैं. यही वजह है कि अब जर्मनी समेत यूरोपीय देश अमेरिका के तहखाने में रखा अपना सोना वापस चाहते हैं. जिस तरह से ईरान युद्ध में ट्रंप की रणनीति दिख रही है, यूरोप अमेरिका से दूरी बनाने लगा है. सबसे बड़ी बात, ट्रंप ने ईरान युद्ध के जरिए दुनिया को बड़े युद्ध के सामने खड़ा कर दिया है. महंगाई बढ़ रही है, तेल के दाम आसमान छू रहे हैं. ऐसे हालातों में सोना ही वह एकमात्र संपत्ति बचती है, जिसकी वैल्यू कम नहीं होती. इसीलिए अब ये देश अपना सोना अमेरिका से निकालकर अपने देश लाने में जुटे हैं.





