सीबीसी को कंप्लीट ब्लड काउंट टेस्ट कहा जाता है. इससे हमारी बॉडी में प्लेटलेट काउंट और रेड ब्लड सेल्स की संख्या कितनी है ये बता चलता है. ये एक सिंपल टेस्ट है लेकिन कई दिक्कतों का संकेत भी दे देता है. डॉ. नरेंद्र अग्रवाल बताते हैं कि इस टेस्ट से कुछ ब्लड कैंसर जैसे ल्यूकेमिया का पता चल सकता है या संकेत मिल सकता है.

लेकिन इसमें केवल सीबीसी ही नहीं, होता है साथ में पेरीफेरल ब्लड स्मीयर भी देखना होता है, यानी माइक्रोस्कोपिकली ब्लड की एक फिल्म बनाकर यह देखना होता है कि उसके अंदर किस तरह के सेल्स हैं.
एक्सपर्ट बताते हैं कि सीबीसी टेस्ट से भी ज्यादा जरूरी है पेशेंट की फिजिकल एग्जामिनेशन और उनकी मेडिकल हिस्ट्री, यानी कि पेशेंट को क्या सिम्पटम्स आए हैं, कितने दिन से वो लक्षण हैं, और फिजिकल एग्जामिनेशन में उनके क्या फाइंडिंग्स हैं, जो कि अक्सर डॉक्टर्स अपने नोटिस में लेते हैं.
उदाहरण के तौर पर
क्या उनके लिंफ ग्लैंड्स का साइज बड़ा हुआ है?
क्या वो पैल्पेबल हैं ?
स्प्लीन का साइज कैसा है?
शरीर में कहीं चकत्ते, लाल, काले, नीले धब्बे तो नहीं?
या कहीं से ब्लीडिंग होने के संकेत तो नहीं?
इस तरह की निष्कर्ष ब्लड कैंसर जैसी बीमारियों के डायग्नोसिस में बहुत सहायक होती हैं.
कैंसर जिनका सीबीसी से संकेत नहीं मिल पाता
ऐसे कई ब्लड कैंसर हैं जिनका सीबीसी से अक्सर संकेत नहीं मिल पाता, जैसे कि लिम्फोमा या मल्टीपल माइलोमा . इस तरह के केस में सीबीसी या ब्लड फिल्म के अंदर कैंसर सेल्स अक्सर नहीं देखे जाते.
पर सामान्य शारीरिक जांच के बाद अगर ऐसा कोई शक या लक्षण है, तो बायोप्सी किया जा सकता है. बायोप्सी का मतलब है कि शरीर के किसी ग्रंथि, नोड या टिशू से एक छोटा टुकड़ा लिया जाए, जांच के लिए माइक्रोस्कोपिकली लैब में टेस्ट किया जाए. इससे अक्सर लिम्फोमा जैसी बीमारियों का पता लगता है.
बोन मैरो जांच
उसी तरह से बोन मैरो की जांच, जो कि अक्सर हिप बोन या कूले की हड्डी से नीडल के द्वारा सैंपल लिया जाता है. इसे माइक्रोस्कोपिक चेक करके माइलोमा और ल्यूकेमिया जैसी बीमारियों के लक्षण भी उसमें देखे जा सकते हैं.
मॉलिक्यूलर टेस्ट
आज के समय में ब्लड कैंसर का शक या डायग्नोसिस होने पर और भी कई मॉडल या नए टेस्ट किए जाते हैं, जिनको मॉलिक्यूलर टेस्ट कहते हैं. ये कैंसर के सेल्स के अंदर होने वाले डीएनए या डीएनए के अंदर होने वाले म्यूटेशन या बदलाव की विस्तृत जांच है.
इससे हमें ये पता लगता है कि सेल्स जिनसे कैंसर पैदा हुआ है, उन सेल्स में क्या बदलाव हुए, उनके डीएनए में ऐसे क्या बदलाव हुए जिसकी वजह से कैंसर बना. इस जानकारी से हमें बीमारी के प्रोग्नोसिस और कभीकभी उपचार को समझने में भी मदद मिलती है.
इलाज के ऑप्शन
आज के समय में अधिकांश ब्लड कैंसर के लिए कारगर इलाज उपलब्ध है, जिनमें कीमोथेरेपी की दवाएं हैं, साथ ही नई दवाएं या आधुनिक दवाएं, जिनमें इम्यूनोथेरेपी जैसी दवाएं हैं. सिलेक्ट किए गए रोगियों में, जिनमें ज्यादा उच्चजोखिम वाली बीमारी है, उनमें बोन मैरो या स्टेम सेल ट्रांसप्लांट और CART जैसे आधुनिक इलाज भी प्रयोग में लाए जा सकते हैं.
इन सब नए और बेहतर इलाजों से कई बार उच्चजोखिम वाले रोगियों में से भी कुछ रोगियों को बेहतर जिंदगी दी जा सकती है, या कैंसर को कुछ समय तक या लंबे समय तक नियंत्रण में किया जा सकता है.
सबसे जरूरी बात
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी तरह के लक्षण या संकेत हों, उसको तुरंत कैंसर न समझा जाए. पहले डॉक्टर को दिखाएं, सलाह लें, उनसे अपनी शारीरिक जांच कराएं और जरूरत पड़ने पर सीबीसी या अन्य ब्लड टेस्ट कराएं. उनके बाद ही अगर उनमें कोई संकेत मिलता है, तो कैंसर जैसी बीमारी का शक अगर है, तो आगे के टेस्ट जैसे कि बोन मैरो जांच, बायोप्सी, PETCT या पेट और सीटी स्कैन, मॉलिक्यूलर टेस्ट, यह सब करना चाहिए.