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कुत्तों के काटने से होते हैं 99% रेबीज केस, मौत का खतरा 100 परसेंट, आप कैसे बचें?​

हर साल 28 सितंबर को ‘वर्ल्ड रेबीज डे’ पर रेबीज को खत्म करने को लेकर जागरुकता फैलाने के लिए दुनियाभर के लोग साथ आते हैं. इस साल के ‘वर्ल्ड रेबीज डे’ की थीम “स्ट्रॉन्गर टुगेदर” यानी “साथ मिलकर और मजबूत” है. ये थीम अस बात पर जोर देती है कि रेबीज को तभी खत्म किया […]

हर साल 28 सितंबर को ‘वर्ल्ड रेबीज डे’ पर रेबीज को खत्म करने को लेकर जागरुकता फैलाने के लिए दुनियाभर के लोग साथ आते हैं. इस साल के ‘वर्ल्ड रेबीज डे’ की थीम “स्ट्रॉन्गर टुगेदर” यानी “साथ मिलकर और मजबूत” है. ये थीम अस बात पर जोर देती है कि रेबीज को तभी खत्म किया जा सकता है जब हम सब साथ मिलकर काम करें, क्योंकि ये एक बेहद गंभीर समस्या है. इससे निपटने के लिए सरकार से लेकर स्वास्थ्य कर्मियों, स्थानीय समुदायों, शिक्षकों तक का सहयोग आवश्यक है. रेबीज कुछ और जानवरों के जरिए भी फैल सकता है, लेकिन 99 प्रतिशत मामले कुत्तों के काटने या खरोंच की वजह से ही फैलते है. अगर छोटीछोटी सावधानियां बरती जाएं तो इससे बचा जा सकता है.

रेबीज के संक्रमण के संपर्क में आने को तीन कैटेगरी में रखा जाता है. उसी के हिसाब से डॉक्टर पीईपी का उपयोग करने जैसी सलाह देते हैं. आमतौर पर रेबीज शरीर में फैला है या नहीं इसे लेकर कोई सटीक तरीका अभी तक नहीं है और न ही इसका इलाज है. ऐसे में घाव की सफाईदेखभाल से लेकर टीकाकरण कराना ही सही रहता है. चलिए इस बारे में डिटेल के साथ जान लेते हैं.

कुत्ते के अलावा इन जानवरों से फैल सकता है रेबीज

मनुष्यों में रेबीज आमतौर पर जानवरों की लार के माध्यम से फैलता है. इसमें काटना, खरोंच लगना, श्लेष्मा के जरिए जैसे खुले घाव में रेबीज का संपर्क, आंखों, मुंह के जरिए गलती से संपर्क में आने की वजह से रेबीज फैल सकता है. कुत्ते के अलावा बिल्लियां, दूसरे पालतू जानवर, जंगली जानवर समेत स्तनधारी जीव इससे संक्रमित होते हैं, जिनसे इंसानों में रेबीज फैल सकता है. हालांकि की रिपोर्ट कहती है कि इंसानों 99 प्रतिशत मामलों में रेबीज वायरस कुत्तों के कारण ही फैलता है. इसमें भी 5 साल की उम्र से लेकर 14 साल तक के बच्चे अक्सर इसका ज्यादा शिकार होते हैं.

कब होता है मौत का खतरा?

जब किसी में रेबीज फैलता है तो तुरंत इसपर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि जब इसके नैदानिक लक्षण दिखाई देने लगते हैं तो इसमें मौत का खतरा 100 प्रतिशत होता है. आमतौर पर किसी के रेबीज के संपर्क में आने के बाद लक्षणों के दिखने का समय 23 महीने होता है. हालांकि वायरस शरीर के किस हिस्से से और किस तरह से प्रवेश हुआ है. इस पर भी निर्भर करता है कि लक्षण 1 हफ्ते से 1 साल तक हो सकते हैं.

रेबीज के लक्षण

शुरुआती तौर के लक्षणों की बात करें तो रेबीज में बुखार, दर्द और घाव वाली जगह पर असामान्य या थोड़ी बहुत झुनझुनी, चुभन या जलन जैसी सामान्य समस्याएं महसूस हो सकती हैं. जब ये वायरस धीरेधीरे तंत्रिका तंत्र में फैलना लगता है और मस्तिष्क के साथ ही रीढ़ की हड्डी में बढ़ने लगता है तो घातक सूजन पैदा होने लगती है. मनुष्यों में वैसे तो रेबीज का प्रबंधन किया जा सकता है, लेकिन बहुत कम मामलों में ही ये ठीक होता है. वहीं ये गंभीर तंत्रिका तंत्र के विकारों के बिना संभव नहीं होता है.

दो तरह का होता है रेबीज

रेबीज को भी दो कैटेगरी में रखा जाता है. इसमें एक भयंकर रेबीज होता है, जिसमें बहुत ही गंभीर लक्षण दिखाई देना शुरू हो जाते हैं, जैसे हाइड्रोफोबिया होना. इसमें पेशेंट को पानी से डर लगने लगता है. इसी के साथ एयरोफबिया भी होने लगता है. इस वजह से हवा के झोंके, ताजी हवा तक से मरीज बुरी तरह डर सकता है. उसमें कुछ दिनों के बाद मृत्यु हो जाती है.

दूसरी तरह के रेबीज में इंसान लकवाग्रस्त हो जाता है. हालांकि इंसानों में ऐसे मामलों का प्रतिशत लगभग 20 ही है. इसमें आमतौर पर लंबी अवधि होती है, जिसमें घाव से शुरू होकर मांसपेशियां धीरेधीरे काम करना बंद करने लगती हैं, जिससे लकवा की स्थिति बन जाती है और कोमा हो सकता है. इसमें भी पेशेंट की मौत हो जाती है.

बचाव ही है इलाज

  • अभी तक लक्षण दिखने से पहले रेबीज का संक्रमण पता लगाने के लिए किसी तरह की जांच या उपकरण मौजूद नहीं है. ऐसे में रेबीज के संपर्क में आने के बाद तुरंत इससे बचने के उपाय करना जरूरी होता है.
  • रेबीज संक्रमण के संपर्क में आने पर तुरंत बाद कम से कम 15 मिनट तक साबुन से बहते पानी में घावों को अच्छी तरह से धोना चाहिए.
  • खरोंच लगने, पहले से मौजूद घाव पर लार लगने, आंखों तक के संपर्क में आने पर डॉक्टर से मिलकर जानकारी लें और पीईपी का पूरा कोर्स लेना चाहिए.
  • जानवरों को छूने, खिलाने के बाद तुरंत हाथों और संपर्क में आई त्वचा को अच्छी तरह साबुन से धोना चाहिए.
  • अगर मामूली खरोंच है और घर्षण है, लेकिन स्किन से ब्लड नहीं आया है तो भी तुरंत धोना चाहिए और टीकाकरण कराएं.
  • अगर एक से ज्यादा बार त्वचा पर कटा है या खरोंच लगी है या घव पर जानवर ने चाटा है तो आवश्यक है कि घाव में इम्युनोग्लोबुलिन या मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का इंजेक्शन लगवाना चाहिए.
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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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