कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को एक कर्मचारी के Employees’ Pension Scheme के निकासी लाभ की गलत गणना करना महंगा पड़ गया. हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने EPFO को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए कर्मचारी को बकाया राशि के साथ 9% ब्याज, ₹1,000 मुआवजा और ₹2,500 मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया है. आयोग ने माना कि EPFO ने नियमों के अनुसार सही फैक्टर लागू नहीं किया, जिससे कर्मचारी को ₹1,350 कम भुगतान हुआ.

क्या था पूरा मामला?
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बैजनाथ निवासी एक कर्मचारी ने 4 अप्रैल 2024 से 15 मार्च 2025 तक एक निजी स्कूल में आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिए क्लर्क के रूप में काम किया. नौकरी के दौरान उसके वेतन से नियमित रूप से EPF और EPS का अंशदान काटकर EPFO में जमा किया गया.
नौकरी छोड़ने के बाद कर्मचारी ने EPS निकासी के लिए आवेदन किया. EPFO की वेबसाइट पर उपलब्ध पासबुक में पेंशन योगदान ₹14,230 दिख रहा था, लेकिन उसके बैंक खाते में केवल ₹12,750 ही जमा किए गए. कई शिकायतों के बावजूद समाधान नहीं मिलने पर कर्मचारी ने जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया.
EPFO ने क्या सफाई दी?
EPFO ने आयोग के सामने कहा कि कर्मचारी की सेवा अवधि में 16 दिन का ‘नॉनकॉन्ट्रिब्यूटरी पीरियड’ था. इसी आधार पर उसकी पेंशन योग्य सेवा 10 महीने मानी गई और Employees’ Pension Scheme, 1995 के नियमों के अनुसार भुगतान किया गया. संगठन का कहना था कि लाभ की गणना ₹15,000 की अधिकतम वेतन सीमा के आधार पर की गई थी.
आयोग ने कैसे पकड़ी गलती?
आयोग ने पाया कि EPFO अपने 16 दिन के नॉनकॉन्ट्रिब्यूटरी पीरियड के दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज या रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका. रिकॉर्ड से साफ था कि कर्मचारी ने लगातार 11 महीने 12 दिन तक काम किया था. ऐसे में 10 महीने का फैक्टर लगाना गलत था.
आयोग ने कहा कि कर्मचारी की सेवा अवधि के अनुसार 0.94 फैक्टर लागू होना चाहिए था, जबकि EPFO ने 0.85 फैक्टर का इस्तेमाल किया. सही गणना के अनुसार कर्मचारी को ₹14,100 मिलने चाहिए थे, लेकिन उसे ₹12,750 ही दिए गए. इस तरह ₹1,350 का कम भुगतान हुआ.
क्या है इस फैसले का महत्व?
यह फैसला उन लाखों EPFO सदस्यों के लिए अहम है जो EPS निकासी या अन्य दावों का भुगतान प्राप्त करते हैं. यदि पासबुक में दर्ज राशि और वास्तविक भुगतान में अंतर दिखाई देता है या गणना में गलती का संदेह हो, तो सदस्य EPFO से स्पष्टीकरण मांग सकते हैं. जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता आयोग या अन्य कानूनी मंच पर भी न्याय की मांग की जा सकती है. यह फैसला साफ करता है कि EPFO जैसी वैधानिक संस्था भी गलत गणना के लिए जवाबदेह हो सकती है.